बातें होती ही रहती हैं, होती भी रहेंगी...
बातों का क्या है,
पर ये ख़्याल समर्पित है उन्हें जो बात को समझे तो नहीं हैं पर समझाते खूब हैं।
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वो कहते रहे,
मैं सुनता रहा,
सिलसिला चलता रहा।
सुनते-सुनते फिर शाम ढली,
जब शाम ढली तो पता चला।
जो बात वो मुझसे कहते हैं,
वे ख़ुद भी नहीं समझते हैं।
फिर क्यों वे कहते रहते हैं,
न उन्हें पता, न मुझे पता।
मैं उठा,
उठे वो साथ मेरे, मैं इधर गया,
वो किधर गए?
कुछ नहीं पता, कुछ नहीं पता।
-अंशुल।
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