काश,
बस कुछ देर और
जो नींद नहीं टूटती।
तो,
तैरता मैं सपनों की झील में,
उड़ता ख़्याल के बादल पर,
टहलता ख़्वाबों के समंदर किनारे,
कुछ देर और भीग लेता,
ख्वाहिशों की बारिश में।
मगर करूँ क्या??
रात जब भी हसरतें थपकियाँ देकर सुलाती हैं,
ज़रूरतें झंझोड़कर जगाने चली आती हैं।
- अंशुल।
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