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Tuesday, 22 November 2016

उलझन...

सुनता आया हूँ
हमेशा कि, काफ़ी है
समझदार को इशारा ही।
मगर मैं सोचता हूँ,
वो जो समझदार है,
उसे क्यूँ चाहिए इशारा??
क्यूँ नहीं वो समझ सकता,
हालत को देखकर,
या महसूसकर??
और यदि फिर भी चाहिए,
इशारे का सहारा,

तो नासमझ करे क्या बेचारा??

-अंशुल।

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