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Wednesday, 21 March 2018

वो जो ठहरा...

वो जो ठहरा, सो मिट गया देखो,
ज़िन्दगी दरिया की, रवानी है।

आज फिर हमें पार जाना है,
आज फिर समंदर तूफ़ानी है।

कोई भी चुन ले राह, और चल दे,
उम्र क्या सोच में बितानी है।

आज ये फ़ैसला होगा बस के,
जान लेनी है या लुटानी है।

हारना तय हो फिर भी खेलेंगे,
आज किस्मत भी आज़मानी है।

ख़्वाब ताबीर तक नहीं पहुँचे,
बस यही दिल को परेशानी है।

कोशिशें कीजिए, कुछ तो होगा,
यही सबक-ए-ज़िन्दगानी है।

-अंशुल।

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