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Thursday, 1 March 2018

।।छंद।।

(1)

नासिका के आदि में, विराजती युगल जोरी,

वाम और दक्षिण की, छटा अति न्यारी है।।

जिनपे प्रसन्न हो वे, धन्य अनुभूति करें,

गोचर हों जो वे निर्वाण, अधिकारी हैं।।

तपती धरा को जैसे, त्राण देती बरखा है,

आकुल हृदय हित तैसे ही सुखारी है।।

प्यारी मनोहारी इस जोरि को विलोकत ही,

शोभा दूज चन्द्र की भी, जात बलिहारी है।।

(2)

नवल कमल खिल गए जैसे वाटिका में,

नयनों की जोरि समरूप ये बनाई है।।

पुष्प बीच गंध जिस भाँति है निवास करे,

मद की पिटारी दृग मध्य त्यों समाई है।।

पा गए जो दृष्टिपात, आप्तकंठ भाग्यवन्त,

भूरि-भूरि नयनों की महिमा ते गाई है।।

झील से गहन इन नयनों ने देखो आज,

प्रभुता समुद्र की भी, पल में भुलाई है।।

-अंशुल।।

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