जिस माटी को बालकृष्ण ने अपने तन पर स्थान दिया,
ब्रजवासी, ब्रजराज कहाए, जिसको चिर सम्मान दिया।
उसका दर्शन स्वयं कृष्ण के दर्शन से कम होगा?
जिस माटी ने भारत को केशव सा तनय महान दिया।
-अंशुल।
(01.12.18// वृंदावन दर्शन)
जिस माटी को बालकृष्ण ने अपने तन पर स्थान दिया,
ब्रजवासी, ब्रजराज कहाए, जिसको चिर सम्मान दिया।
उसका दर्शन स्वयं कृष्ण के दर्शन से कम होगा?
जिस माटी ने भारत को केशव सा तनय महान दिया।
-अंशुल।
(01.12.18// वृंदावन दर्शन)
कहानी जंग की सारी कहेंगे,
ये दीपक रात भर यूँही जलेंगे।
सियाही रात की सारी धुलेगी,
ये झरने रौशनी के जब बहेंगे।
अकेला दीप जब देगा चुनौती,
अंधेरे हाथ बस अपने मलेंगे।
ख़ुदा! इस नर्म दिल पे वार तीखे,
बता तू ही भला कब तक सहेंगे।
कभी तो चाँद बन के आओगी तुम,
कभी तो आशिक़ों के दिन फिरेंगे।
निशाने पे लगी है जान फिर भी,
क़दम अपने नहीं पीछे करेंगे।
मुहब्बत बस किताबों में बची है,
तेरे इस कौल को झूठा करेंगे।
ग़ज़ल कहने में यों तो मुश्किले हैं,
मगर कोशिश मुसलसल हम करेंगे।
किसी दिन ख़्वाब ये होगा मुक़म्मल,
ख़ुशी के फूल घर-घर में खिलेंगे।
सुबह की इंतजारी शाम से है,
कल उनसे हम बहाने से मिलेंगे।
अगर तुम हाथ थामे चल पड़ोगी,
नहीं हम ज़िन्दगी में फिर गिरेंगे।
ज़रा तुम छेड़ दो तो बात ही क्या?
ये नदिया, पेड़, भी बातें करेंगे।
तुम्हें देखा, खिले कुछ फूल दिल में,
जो मिलने आओ... बागीचे खिलेंगे।
तुम अपनी राह चलते जाओ प्यारे,
खड़े हर मोड़ पर हम ही मिलेंगे।
मुहब्बत का मज़ा है डूबने में,
गधे हैं क्या, जो हम इससे तरेंगे?
सुहानी शाम बन बैठो कभी तो,
सितारे माँग में उजले जड़ेंगे।
डरे हैं जब से शादी हो गई है,
वगरना, हम किसी से क्या डरेंगे??
-अंशुल तिवारी
धनतेरस/ 05.11.18/हरिद्वार।
(रंगोली: Vanshika Awasthi Tiwari)
अजीब आदमी है वो....
बातें भी अजीब करता है!
बेगाना, बेपरवाह,
अलमस्त अपनी दुनिया में!
कभी उसकी बातें सुनकर,
लगता है,
उसने चाँद को देखा है,
बातें करते,
सड़कों पर टहलते,
छत पे चलते,
दरीचे से झाँकते,
छज्जे से ताकते!!
वो सबसे यही कहता,
लोग मान भी लेते हैं,
उसकी बात!
अजीब आदमी है वो....
लगता है उसने,
सुनी है हवा की बोली!
वो पढ़ लेता है,
क्या लिखा है, हवा के आँचल पे,
कोई नाम, कोई पैग़ाम!
फिर, चुपके से पढ़कर,
रख लेता है अपने सन्दूक में।
और, हवा को,
छोड़ देता है,
अपनी गिरफ़्त से!!
अजीब आदमी है वो....
लगता है उसकी मुंडेर पर,
जो डिब्बे रखे हैं,
उनमें रखी है उसने,
धूप, बारिश, फ़ुहारें, बौछार,
बर्फ़, शबनम, पतझर, बहार।
सुना है, वो जब जी चाहे,
मौसमों को आज़ाद कर देता है।
खेलता है उनसे, जी भर कर।
और फिर क़ैद कर लेता है।
अजीब आदमी है वो....
लगता है, वो जानता है,
जादू-टोना भी।
सुना है,
उसने भर रखी है,
एक इठलाती, बलखाती,
गुनगुनाती, मुस्कुराती नदी,
खिड़की के पास रखे घड़े में।
वो जब चाहे उसे छेड़ता है,
बहाता है, जी भर नहाता है।
अजीब आदमी है वो....
लगता है, वो समझता है,
पंछियों की भाषा भी,
मैंने देखा है उसे,
गोरैया से बतियाते,
तितलियों संग खिलखिलाते,
पेड़ों, फूलों से गप्पें लड़ाते।
अजीब आदमी है वो....
लगता है,
उसे आती है उड़ने की कला,
वह जब चाहे, किसी बादल को,
पकड़कर, उड़ चलता है।
सुदूर, अनन्य लोकों की सैर पर!
बादलों पर उड़कर यहाँ से वहाँ,
वो देख चुका है, ये दुनिया!!
और किसी अन्वेषक की तरह,
लिख देता है जो देखा है!!
सुना है, वो सब कुछ जानता है!!
सच में,
अजीबआदमी है वो....
पर उससे अजीब ये बात है!
कि, जो दिन में इतना कुछ,
कर जाता है!
कौतूहल रच जाता है!
असंभव, अकल्पित को,
परिभाषित कर जाता है।
शाम ढलते ही न जाने,
उसे क्या हो जाता है?
आज शाम ढलते ही,
मैंने उसे देखा...
वो चुपचाप, अकेला,
एक खाट की गोद में,
थककर सो जाता है!
काग़ज़ पर कुछ लिखता-लिखता,
खो जाता है।
मुझे नहीं पता ये कौन है??
ये,
ख़ुद को कवि बतलाता है।
- अंशुल तिवारी।
हरिद्वार/ 28.11.18
हे राम!
सुना है आज,
तुम्हारी प्रतिमा भव्य बनेगी।
द्रुतगति से दावानल-सा,
ये समाचार हर ओर गया है।
भू स्थापित होगी प्रतिमा,
व्योम पर होगा शीष तुम्हारा।
हे राम! सुना है ये कि,
अवध में उत्सव होगा भारी।
गूँजेगी जयकार तुम्हारी,
आनंदित होंगे नर-नारी।
एक लक्ष्य हो, शासन सारा,
कमर कस रहा, करे तैयारी।
मंचों से ये हो उठी घोषणा,
झोंकेंगे हम शक्ति सारी।
मैं भी तो खुश बहुत हूँ,
मैं हूँ भक्त तुम्हारा।
हृदय परम् उत्साही है,
मन सोच का मारा।
सोच रहा हूँ, ये जो प्रतिमा बनवाते हैं,
ज़ोर-ज़ोर से नाम तुम्हारा चिल्लाते हैं।
क्या बनने के बाद भी तुमको याद रखेंगे?
क्या विराट प्रतिमा का किञ्चित ध्यान धरेंगे?
क्या कोई देखेगा इसपर धूल जमेगी?
किसी चौक पर निपट अकेली खड़ी रहेगी??
क्या पश्चात स्थापना के भी, कोई शीष नवाएगा??
या केवल बस देख इसे, दृग झुका चला वह जाएगा?
शुष्क सुमन क्या सजे रहेंगे? मस्तक पर रघुनन्दन के,
सूखे टीके लगे रहेंगे! क्या कुमकुम के, चन्दन के??
क्या चुनाव के बाद भी कोई तथाकथित जन नेता,
इसपर पुष्प चढ़ाने या,
मानस की पंक्ति सुनाने आएगा?
क्या कोई विषभरा शीष षड्यंत्र रचयिता,
श्रद्धा से भर जाएगा??
और नीचता तजे राम की चरण शरण में आएगा?
निर्वाचन उपरांत राम को कौन पूछता आएगा?
इस विराट प्रतिमा पर बलि-बलि जाएगा??
उत्सव कुछ दिन होगा, फिर सब जन स्मृति से हट जाएगा।
नकली ये आवरण भक्ति का, बहुत जल्द फट जाएगा।
दुख है ये, जिस परमपुरुष ने इस भारत में,
मर्यादा को परिभाषा दी।
थके हुए ,बोझिल नैनों को, भटके, व्याकुल,
लोगों को फिर आशा दी।
जिसने, नरता का जग में आदर्श दिया था,
जिसने जन कल्याण हेतु ही कष्ट सहा था।
जिसने अपने चरणों से,
पाषाण हुई गौतम पत्नी को,
मुक्त किया था, शुद्ध किया था।
आज उसे ही क्षुद्र लाभ हित,
तुम पत्थर में, बांध रहे हो।
अति विराट रघुकुल भूषण को,
सीमित कद में साध रहे हो!!
जिस दिन तुम प्रतिमा बनवा कर,
मर्यादापुरुषोत्तम को पत्थर में चुनवा कर।
हिन्दू गौरव, दम्भ वेदी पर बली चढ़ाकर।
कर्मकांड से प्राण प्रतिष्ठा करवाओगे,
जग को अपनी भक्ति कदाचित दिखलोगे।
स्मरण रखो ये,
राम नहीं आएँगे, इस प्रतिमा में रहने,
राम न आएँगे किञ्चित अन्याय ये सहने।
राम न ठहरेंगे विराट इस छत्र के नीचे,
राम चले जाएँगे, अपनी आंखें मीचे।
राम चले जाएँगे, शबरी की कुटिया में,
नहीं रहेंगे इस सत्ता लोलुप दुनिया में।
अरे राम के भक्तों! अपनी आँखें खोलो,
नहीं राष्ट्र आदर्श ज़रा, सत्ता से तोलो।
सुनो राम के भक्त तभी कहलाओगे,
जब निरीह, निर्धन को गले लगाओगे।
-अंशुल।
बन्दे ने शिकायत की, ऐ पीर! ऐ ख़ुदाया!
मैंने दुआएँ मांगी, क्या क्या नहीं लुटाया?
लेकिन जवाब उनका आख़िर तू दे न पाया,
कहता रहा कि दूँगा, ये हौसला दिलाया,
आये थे जो गए सब, मैं ही रहा बकाया,
पर आरज़ू जो थी वो, पूरी क्यूँ कर न पाया?
इतने सवाब मैंने जो कर रखे थे उनके,
बदले में मुझको तूने बस आदमी बनाया??
(सवाब: पुण्य)
-अंशुल।
करुणा समेटे हृदय में, नयनों में अश्रु भरे हुए,
अतिदीन हो कुंतीतनय ने, ये वचन हरि से कहे।
सुनकर वचन ये वीर के, निज सखा से हरि ने कहा,
हे शूरवीर शिरोमणि! तुझको अचानक क्या हुआ??
किस मोह से पीड़ित हुआ, तू हो गया अति दीन है,
ये आचरण तेरे लिए, अति त्याज्य है, अति हीन है।
तू दीनता को त्याग दे, न कीर्तिपथ अवरुद्ध कर,
कुछ ध्यान कर सद्धर्म का, तू वीरता से युद्ध कर।
ये है नपुंसकता सखे, तुझको न शोभा दे रही,
अपना प्रबल साहस जगा, है रास्ता तेरा यही।
अर्जुन पुनः कहने लगा, हे कृष्ण! ये बतलाईए,
क्या राज लिप्सा के लिए यह कृत्य करना चाहिए?
इक भूमि के टुकड़े को पाने के लिए, केशव कहो,
गुरु, तात का वध मैं करूँ, क्या है उचित बोलो प्रभो?
इससे बहुत अच्छा है, जा कर तप करूँगा मैं कहीं,
मैं भीख लेकर खाऊंगा, कुल का करूँगा वध नहीं।**
इस तरह सबको मारकर , केशव भला क्या पाऊँगा??
जो भी मिले रण जीत कर, पर हाथ खाली जाऊँगा।
अतएव क्यों मैं तुच्छ निज हित के लिए पापी बनूँ??,
क्यों मैं सकल संसार में, निजवंश का घाती बनूँ??
हे कृष्ण! मैं अति दुःख से होकर ग्रसित, करता विनय,
निज शिष्य मुझको जानिए, ले शरण में कीजै अभय।
संजय उवाच-
राजन्!!कहे जब पार्थ ने भगवान से ऐसे वचन,
हँसते हुए कहने लगे उससे, पुनः मोहन मदन।
श्रीभगवानुवाच-
हे वीर! कैसी तू अनोखी बात करता है भला,
सुनकर जिसे उत्पन्न होता है मुझे अचरज बड़ा।
तू पंडितों-सी बात करता है सखा मेरे, मगर,
फिर मन दुखाता है स्वयं का, शोक में यूँ डूबकर।
ये लोग जिनको तू सगा अपना समझता है यहाँ,
ये सोचकर मुझको बता गत जन्म में ये थे कहाँ?
क्या तू इन्हें पहचानता भी था, तुझे क्या है पता??
इस जन्म के उपरांत, जाएँगे कहाँ मुझको बता??
ये ध्यान रख ये सब यहाँ जो हैं तुझे दिखते खड़े,
अनगिनत जन्मों से इसी संसार में उलझे पड़े।
तू भी नहीं नूतन, पुरातन जीव है तू भी सखा,
इस तत्व को ले जान, यूँ मत शोक इनका कर वृथा।
जिनको यहाँ तू देखकर, है मोह बंधन में पड़ा,
तू जानता क्या है उन्हें सत रूप में मुझको बता?
इस देह के भीतर छुपा है, भेद क्या? सुन भी ज़रा,
हाँ समझ जिसको नष्ट होगा, शोक ये सारा तेरा।
यह देह तो है यन्त्र केवल, एक जैसे म्यान है,
इसमें जो रहता जीव है, उसका न तुझको ज्ञान है।
वह तत्व जो निर्जर, अमर है, जीव-आत्मा है सखा,
शाश्वत, अलौकिक है, अजर है, जो यहाँ रहती सदा।
हाँ, दुःख-सुख का भान केवल देह को होता सदा,
पर यह अनश्वर जीव-आत्मा ,एक-सी रहती सदा।
यह जन्मती-मरती नहीं, ये न बदलती रूप है,
इस भेद तू कर गृहण, ये ज्ञान दिव्य अनूप है।
जो मर नहीं सकती कभी, क्या कोई उसका वध करे?
फिर क्यों सघन संताप लेकर, व्यर्थ तू मन में डरे??
जैसे मनुज तजकर पुराने वस्त्र, लेता है नए,
वैसे ही जीवात्मा बदलती है, पुरानी देह ये।
फिर नए वस्त्रों की तरह, यह देह नव धारण करे,
इस तथ्य को तू जान क्यों संदेह बिन कारण करे?
ना शस्त्र इसको छेदता, ना कष्ट देता है अनल,
न जल डुबोता है इसे, न सुखा सकता है अनिल।
यह तो अछेद्य, अदाह्य है, अशोष्य है, अक्लेद्य है,
मेरी समझ से भेद यह अति गूढ़ है,दुर्भेद्य है।
अव्यक्त है, ये अचिन्त्य है, है यह विकारों से परे,
जो नष्ट होता है नहीं, तू शोक उसका क्यूँ करे??
यदि जीव-आत्मा के विषय में तू नहीं कुछ जानता,
तब भी तेरा यह शोक है अनुचित, यही हूँ मानता।
यह हैं तेरे परिवारजन, पर इसी जीवन में सखा,
पिछले या अगले जन्म में, ये थे कहाँ मुझको बता??
जिसका हुआ है जन्म उसका अंत भी निश्चित समझ,
जो मर चुका, फिर जन्म लेगा, सोच में तू मत उलझ।
तू तो अलौकिक वीर है, क्यूँ हो रहा भयभीत है??
ये रास्ता तेरा नहीं, न क्षात्रकुल की रीत है!!
हर तरह से यह युद्ध तेरे धर्म के अनुकूल है,
तू त्याग करता है इसे, कितनी बड़ी यह भूल है।
यदि इस समय होकर दुखी तू छोड़ देगा रण सखा,
संसार तुझको स्मरण रख, कायर पुकारेगा सदा।
अपमान से क्या और भीषण वीर का है दुख बता?
क्यों शत्रुओं को दे रहा तू, ये अलौकिक सुख बता?
तू हो सबल धनु थाम ले, चिंता से तू क्या पाएगा?
यदि युद्ध में मर भी गया तो धाम मेरे आएगा।
सुख-दुःख को सम जानकर, रण के लिए तैयार हो,
जिससे धरा संतुष्ट हो, इसका तनिक उद्धार हो।
जो कुछ कहा मैने अभी वह ज्ञान का विस्तार है,
सुन, अब तुझे समझा रहा, क्या कर्म का आकार है।
इस गूढ़ कर्मरहस्य को, कुछ लोग ही हैं जानते,
अन्यान्य जन तो भोग को ही हैं यहाँ पहचानते।
जो स्वर्ग और अपवर्ग की लिप्सा में ही उलझे रहें,
वे कर्म के सिद्धांत की अनुशीलना कैसे करें??
जो सार है इस योग का, उसको समझना है तुझे,
अन्यत्र अवरोधों का रखकर ध्यान, बचना है तुझे।
बस है तेरा अधिकार केवल कर्म पर यह जान ले,
फल क्या मिलेगा कर्म से, इस पर तनिक मत ध्यान दे।
आसक्ति का कर त्याग, तू संबुद्ध होकर कर्म कर,
सब ओर से मन को हटा, निर्वाह अपना धर्म कर।
जो है हुआ अब तक नहीं, उसपे तेरा क्या ज़ोर है,
विधि की अलग ही चाल है, जिसका न कोई ठौर है।
तू है धनंजय, रणकुशल, है लक्ष्य भेदन में अटल,
धर धीर, मन को साध ले, कर्तव्य पथ पर हो अचल।
सुख-दुःख, लाभालाभ में, जय-पराजय में, एक हो,
मत शोक, चिन्ता, दुःख में, अपना विलक्ष विवेक खो।
अब समझ ले इस भेद को, जो तुझे बतलाता हूँ मैं,
संसार में ही मुक्ति का यह, मार्ग दिखलाता हूँ मैं।
जो कर्मफल आसक्त है, रुचिहीन निज उद्धार में,
वह तो सदा रहता फँसा, इस व्यूह-से संसार में।
जो आस में फल की हुआ हो, कर्म वो निःसार है,
यह काम योगी का नहीं, ये तो जगत व्यापार है।
जो कर्म के उपरांत करता, कर्मफल की मांग है,
छलता स्वयं को ही, स्वयं के साथ करता स्वांग है।
हाँ है उचित यह,कर्म का फल प्राप्त होना चाहिए,
पर मन न कर्ता का तनिक यूँ, आप्त होना चाहिए।
जो लालसा में है सना वह कर्म तो फलता नहीं,
ज्यों अश्व कोई काठ का ,पग एक भी चलता नहीं।
फल ही जिसे बस चाहिए, वह तो बड़ा दुर्बुद्ध है,
हर कर्म उसका हीन है, है निंदनीय, अशुद्ध है।
वह कर्मबन्धन में फँसा फिर मुक्त होता है नहीं,
पथभ्रष्ट होता, ज्ञान से फिर युक्त होता है नहीं।
जो इंद्रियों का दास बनकर कर्म करता है यहाँ,
वह मुक्ति की इस राह पर फिर पाँव धरता है कहाँ??
हे मित्र मेरे! हे परंतप! मोह तज, स्थितप्रज्ञ हो,
जिससे बने हर कर्म पावन, दिव्य जैसे यज्ञ हो।
है वीर वह, क्षत्रिय वही, मन से न माने हार जो,
संकट पड़े जो सामने, उसको करे स्वीकार जो।
तू वीरकुल भूषण है मेरे सखा, इसका ध्यान धर,
जो आ पड़े स्वीकार ले बस ईश आज्ञा मानकर।
तू वीर है! तू श्रेष्ठ है! ये अतः तेरा धर्म है,
संसार का उद्धार हो जिससे वही शुभकर्म है।
निःशंक होकर तू वरण कर इस सुअवसर का सखा,
संसार को दे त्राण का वरदान ,निज साहस जगा।
जो स्वार्थपरता से विलग होकर, निबाहे धर्म को,
वह सिद्ध योगी ही, समझ पाता जगत के मर्म को।
मत चेतना से हीन बन, निजलाभ केवल साधकर,
नर जन्म पाकर दिव्य तू, मत घोर ये अपराध कर।
मन अश्व की वल्गा पकड़, कर वश इसे हे वीरवर!
भटके यदि सद्धर्म से, ला सुपथ पर फिर खींचकर।
पशुबुद्धि का है काम बस, निजलाभ केवल साधना,
तू है प्रबुद्ध सखा ज़रा, कर सिद्ध परहित कामना।
इस कीच से जब बुद्धि तेरी मुक्ति को पा जाएगी,
यह ज्ञान की गंगा ह्रदय तेरा विमल कर जाएगी।
स्थिर बुद्धि जब धारण करेगा, मुक्ति तू भी पाएगा,
फिर लौट कर संसार के भवबन्ध में ना आएगा।
अर्जुन उवाच-
केशव बताओ थिर मति, क्या आचरण करता भला?
क्या बोलता, क्या सोचता, लक्षण कहो उसके ज़रा।
कहते किसे स्थिप्रज्ञ हैं, मुझको तनिक बतलाइए,
यह तत्व क्या है, कर कृपा मुझको तनिक समझाइए।
सुनकर विनय पृथुपुत्र की, फिर कृष्ण यों कहने लगे,
ज्यों द्रवित हो निर्झर किसी, गिरिगुहा से बहने लगे।
हे मित्र! जो निज कामना कर भस्म, करता यज्ञ है,
संसार में निष्काम कहलाता, वही स्थितप्रज्ञ है।
उद्विग्न जो दुख में नहीं ,सुख में न खोता धीर है,
निज राग, भय, को जीतता, जग में कहाता वीर है।
लेकिन बड़ी उस वीर से भी एक ऐसी शक्ति है,
करती पराजित जो उसे, उसकी छुपी आसक्ति है।
आसक्ति के आधीन होकर, बुद्धि नर खोता सदा,
पर मोल इसका अंततः होता चुकाना है बड़ा।
भ्रम में फंसा आसक्त नर, स्वाधीन रहता है नहीं,
वह दास होकर दुःख फिर क्या-क्या कहो सहता नहीं।
अतएव नर को चाहिए, वह इंद्रियों पर वश करे,
अधीन कर के इंद्रियों को, सुलभ जग में यश करे।
अन्यथा माया में उलझकर बुद्धि तो फिर जाएगी,
सद्धर्म से तुझको हटाकर, कुपथ पर ले जाएगी।
अब मंत्र जो मैं दे रहा हूँ ,मित्र उसको जानकर,
तू स्वयं हो जा सजग, विषयों का तनिक मत ध्यानकर।
यदि विषय का चिंतन करेगा, मोह में फंस जाएगा,
आसक्ति का तब नाग तेरे चित्त को डस जाएगा।
फिर कामना का विष हृदय में जन्म तेरे पाएगा,
जो समय के फिर साथ ,बनकर क्रोध आगे आएगा।
ये सत्य है जब कामना निज लक्ष्य से है चूकती,
बनकर अनल वह क्रोध की, नर का हृदय है फूँकती।
इस तीव्रतम क्रोधाग्नि से, सद्बुद्धि होती भ्रष्ट है,
खोकर स्वयं की बुद्धि को होता मनुज पथभ्रष्ट है।
पथभृष्ट होकर अंततः वह, प्राप्त होता नाश को,
आसक्ति के फलरूप वो, होता सुलभ यमपाश को।
बस इसलिए हे वीरवर, हूँ मैं तुझे समझा रहा,
कर्तव्य तेरे योग्य क्या? इतना तुझे बतला रहा।
निज बुद्धि के इस दीप को, भ्रम की हवाओं से बचा,
कर ध्यान निज सामर्थ्य का, स्थितप्रज्ञ तू हो जा ज़रा।
तुझको प्रभावित भाव कोई भी न जब कर पाएगा,
एकाग्र होकर चित्त तेरा, शक्ति अद्भुत पाएगा।
एकाग्रता से शक्ति पा कर, योग जैसे कर्म कर,
चिंता हृदय से त्याग से, होकर अटल स्व-धर्म पर।
।।द्वितीयोध्याय सम्पूर्ण।।
।।1।।
निज भक्त हित भगवान क्या हैं आज करते जा रहे,
ले हाथ ख़ुद ही भक्त हैं सुपथ पर ले जा रहे।
हरि जानते हैं हर मनुज में है छिपा अर्जुन कहीं,
जो व्यथित होकर मोह से यूँ त्याग न दे रण कहीं।
।।2।।
इस हेतु ही हरि ने रचा ये परम् गूढ़ विधान है,
कर लक्ष्य अर्जुन को दिया, इस विश्व को यह ज्ञान है।
नर के हृदय के शूल का जो, दिव्य एक निदान है,
नर जाति जिस से पाएगी, भविकाल में उत्थान है।
।।3।।
हम आइए अब देखते हैं, क्या हुआ आगे भला?
सुनकर विनय पृथुूपुत्र की गोविंद ने फिर क्या कहा?
अब क्या नाइ चिंता धनंजय के हृदय में आ गई?
जो ज्ञान रवि ओर बादलों की भाँति आकर छा गई।
अर्जुन उवाच:
।।4।।
केशव कहा जो आपने मैं सोचता हूँ जब उसे,
भ्रम का बड़ा यह जाल आकर निकट ग्रसता है मुझे।
है ज्ञान उत्तम कर्म से यह आपने ही है कहा,
फिर क्यूं भयंकर कर्म में मुझको फँसाते हैं भला।
।।5।।
करुणानिधे क्यूँ नाश का पथ आप हैं दिखला रहे,
क्यूँ युद्ध करने की कला, मुझको यहाँ सिखला रहे।
संबंधियों के रक्त से, कैसे धरा को पाट दूँ,
कुल अग्रजों का शीष उन्नत, किस तरह मैं काट दूँ।
।।6।।
ये कर्म कुत्सित है, मलिन है, ये भयंकर पाप है,
मुझसे अधिक इस बात को, ख़ुद जानते हरि आप हैं।
मैं ज्ञान के पथ पर चलूँ, या कर्म को सर पर धरूँ,
इस द्वंद्व में मैं फंस गया, केशव कहो अब क्या करूँ?
।।7।।
भ्रमजाल मेरा काटिए, तम की घटाएँ छाँटिए,
दृढ़ निश्चयी हो जाऊं मैं, कुछ ज्ञान ऐसा बाँटिये।
इस द्वन्द्व से मुझको बचाकर शरण में लेलो प्रभो,
कल्याण जिस से हो मेरा, वह भेद भी मुझसे कहा।
श्री भगवानुवाच:
।।8।।
अर्जुन समझ इस बात को, जो आज कहता हूँ तुझे,
सन्देह के भ्रमजाल से मैं मुक्त करता हूँ तुझे।
अब तक कहा मैन तुझे इस लोक के अचार को,
निष्ठा मनुज के लोक की, इसके सकल विस्तार को।
।।9।।
संसार में दो रूप इन निष्ठा मनुज हैं धारते,
जिस पे स्वयं को दृढ़ बना, हैं धर्म को विस्तारते।
जो ज्ञानियों की राह है, वो ज्ञानयोगायुक्त है,
पथ कर्म योगी का तथा, फल कामना से मुक्त है।
।।10।।
ये पंथ दो हैं, किन्तु इनका लक्ष्य तो है एक ही,
चलकर मनुज इसपर जगाता, शुद्ध आत्म विवेक ही।
ये राह दो हैं किन्तु इनको, पृथक ही मत मान तू,
ये हैं जुड़ी एक-दूसरे से, भेद ये भी जान तू।
।।11।।
बस त्याग करके कर्म को, नर ज्ञान भी पाता नहीं,
और कर्म बिन निष्कर्मता का, बोध भी आता नहीं।
अतएव दोनों राह में, बिन कर्म कुछ होता नहीं,
यह बात जो है जानता, वह मोह में खोता नहीं।
।।12।।
यह सत्य है नर कर्म बिन क्षण एक रह सकता नहीं,
इस नियम को मिथ्या जगत में कोई कह सकता नहीं।
हो प्रकृतिस्थ सदैव नर करता यहाँ पर कर्म है,
गुणधर्म ये है सृष्टि का, संसार का यह मर्म है।
।।13।।
ये प्राकृतिक गुण सृष्टि के नर को प्रभावित कर सखा,
आसक्ति के अंकुर सभी देते हैं उसमें भर सखा।
अतएव ,तू यह जान ले, है कर्म चिंतन से जुड़ा,
चिंतन जुड़ा है बुद्धि से, सम्बन्ध इनका है बड़ा।
।।14।।
इस लोक में बस नर वही उत्तम कहाता है सखा,
आसक्ति तज, जो इन्द्रियों पे वश चलाता है सखा।
संसार का ये सार है, वेदोल्लिखित यह ज्ञान है,
ये है विधाता का नियम, विधि का अनूप विधान है।
।।15।।
इस चक्र से संसार के होता वही बस मुक्त है,
हर कर्म जिस नर का, अकिंचन स्वार्थ से परिमुक्त है।
तू किसलिए इस कर्म के पथ से फिसलता है सखा?
बन दृढ़ नहीं क्यूँ कर्म के पथ पर निकलता है सखा?
।।16।।
क्या पाएगा निष्क्रियता से, सिर्फ़ अपयश पायेगा,
हे वीर! तेरे पास फिर कह और क्या रह जायेगा??
तू श्रेष्ठता का कर वरण, मत हीन हो, मत दीन हो!
उत्तम यही बस राह है, तू कर्मयोगासीन हो।
।।17।।
यह देख किञ्चित सृष्टि का सिद्धांत टलता है नहीं,
बिन कर्म के संसार क्रम देख चलता है नहीं।
जड़जीव, चेतन औ' अचेतन, जानते बिन जानते,
निर्वाह करते हैं तथा, हैं कर्म को ही मानते।
।।18।।
हे धनंजय! पर जान ले इस कर्म में भी भेद है,
सामान्य जन इसको नहीं हैं जानते यर खेद है।
वैसे तो हर इक जीव ही करता यहां पर कर्म है,
लेकिन यहाँ हर कर्म कहलाता नहीं सत्कर्म है।
।।19।।
सद्कर्म है वो मुक्ति जो नर को दिलाता है सखा,
जो आत्म को परमात्म से जाकर मिलता है सखा।
सद्कर्म तो यज्ञ, जिसका फल पुनीत, पवित्र है,
सद्कर्म उद्धारक है नर का, ये हितैषी मित्र है।
।।20।।
जो है नहीं सद्कर्म वो, अपकर्म होता है सखा,
अपकर्म से बस नष्ट नर का धर्म होता है सखा।
सद्कर्म क्या? अपकर्म क्या? ये भी बताता हूँ तुझे,
निश्चिंत होकर बैठ, सुन अब जो सुनता हूँ तुझे।
।।21।
हैं कर्म के दो रूप जो ,सद्कर्म और अपकर्म है,
इसमें छिपा है जो वही, नर की विजय का मर्म है।
वह कर्म जो मानव को बन्धन से दिलाता मुक्ति है,
जिसमें कि जन कल्याण की शुभ भावना की युक्ति है।
।।22।।
वह कर्म जो कर्तव्यपालन के निमित्त किया गया,
जिसमें समाजोत्थान का संदेश दिव्य दिया गया।
वह कर्म जिसका लक्ष्य है, हित साधना हर एक का,
वह कर्म जो प्रतिसाद है, परिशुद्ध आत्मविवेक का।
।।23।।
वह कर्म जो निजता रहित सर्वस्व के हित में रहे,
वह कर्म जो, निष्काम गंगा नीर-सा, पावन बहे।
वह कर्म जो सिखलाए सबमें स्वयं को ही देखना,
वह कर्म जो उज्ज्वल, धवल हो, त्याग की हो देशना।
।।24।।
वह कर्म जो फलकामना कि लालसा से मुक्त हो,
वह कर्म जो प्रतिदान हो, सनकल्पस सेवा युक्त हो।
वह का ही सद्कर्म है, वह कर्म पावन यज्ञ है,
अतिरिक्त इसके जानता जो कर्म को ,वह अज्ञ है।
।।25।।
यह सोच जो तुझको मिला सब है इसी संसार से,
सम्मान ये धन धाम वैभव,सुख विभिन्न प्रकार के।
मानव यहाँ ले जन्म, खाली हाथ आता है सखा,
कर समय अपना पूर्ण खाली हाथ जाता है सखा।
।।26।।
अतएव ऋण संसार का हर एक पर होता सदा,
जिसको चुकाना एक है कर्तव्य ये तेरा बड़ा।
तू इसलिए संसार के हित में लगा निज कर्म को,
संसार सेवा से सुदृढ़ कर वीर अपने धर्म को।
।।27।।
इस रूप में ही कर्म कर, तू मुक्ति पाएगा सखा,
इस राह से तू, योगियों के लोक जाएगा सखा।
संसार में जो कर्म पथ, नर श्रेष्ठ चुनते हैं यहाँ,
अन्यान्य जन भी राह केवल वही चुनते हैं यहाँ।
।।28।।
हाँ ,श्रेष्ठ जन जिस जिस तरह व्यवहार करते हैं यहाँ,
सब लोग अपना काम उस अनुसार करते हैं यहाँ।
वैसे यहाँ जो कर्मयोगी,निजस्वरूपाधीन है,
उसके लिए तो, स्थूल कर्मों की व्यवस्था हीन है।
।।29।।
जो निर्विकारी, निरंकारी, शुद्ध ,चेतन चित्त हो,
जो स्वार्थ, भय, अपमान, चिंता ,से पर हो, रिक्त हो।
निष्काम होकर, ब्रम्ह चिंतन में सदा तल्लीन हो,
जो स्वयं में संतुष्ट हो, जैसे के जल में मीन हो।
।।30।।
जिसको नहीं कुछ चाहिए, आसक्त जो नर है नहीं,
उसके लिए ये कर्म का प्रतिबंध रहता है नहीं।
तू देख मुझको ही ज़रा, तू ही बता क्या सत्य है,
संसार में मेरे लिए क्या काम्य कोई कृत्य है?
।।31।।
ऐसा नहीं कुछ भी यहाँ जो सुलभ मुझको है नहीं,
फिर भी इस कर्म का परित्याग करता मैं नहीं।
यह इसलिए कि मनुज मुझसे प्रेरणा लेकर यहाँ,
निर्वाह करता है सदा कर्तव्य का अपने यहाँ।
।।32।।
यदि कर्म ही मैं न करूँ, तो ले मेरे आदर्श को,
नर त्याग देगा का, देगा जन्म अन्योत्कर्ष को।
इससे अराजकता जगत में, व्याप्त होती जाएगी,
सुख-समृद्धि नर भाग्य से, अप्राप्त होती जाएगी।
।।33।।
इस से जगत का संतुलन ही भंग होता जाएगा,
उत्तर-ओ-उत्तर कूप में अंधे ये खोता जाएगा।
नर हो दिशा से हीन जैसे, दैत्य ही हो जाएगा,
उसमें निहित जो दिव्य गुण है, सदा को खो जाएगा।
।।34।।
अतएव इस संसार में है जो नरों में श्रेष्ठ नर,
वह तो सदा निर्वाह करता है स्वयं का धर्म पर।
जिसके किए हर कर्म का आधार है, जन लाभ ही,
वह लोक के हित हेतु ही, है चाहता धन लाभ भी।
।।35।।
जो लोकसंग्रह रत हुआ, करता यहाँ पे कर्म है,
वह मुक्त होता सृष्टि से, पाता समझ वह मर्म है।
संसार का आधार है, मंगल सभी का चाहना,
सबको स्वयं-सा जानना, सबको स्वयं-सा मानना।
।।36।।
मैं इसलिये धर रूप नर का, सीख हूँ देता यही,
है मनुज का यह धर्म, होना मनुजता का हितैषी।
इस धर्म पर होजा अचल, दैवीयता को पा सखा,
इस मनुजता के धर्म पर, तू प्राण भी आपने लुटा।
।।37।।
इस भाँति अपने धर्म पे रह मरण भी है श्रेयकर,
निज धर्म की रक्षार्थ जो भी बन सके कर वीरवर।
इस मनुजता के धर्म से बढ़कर न कोई पंथ है,
जो पालता इसको नहीं उसका सुनिश्चित अंत है।
।।38।।
सुन कृष्ण की बातें तुरत, अर्जुन पुनः कहने लगा,
हे देव! मेरे हृदय में संदेह होता है बड़ा।
इस धर्म की अनुपम डगर से मनुज क्यूँ होता विलग?
है क्या जो उसको नीतिपथ से, कृष्ण कर देता अलग?
।।39।।
अर्जुन-उवाच:
किससे प्रभावित हो मनुज करता जगत में पाप है?
किस हेतु उसके चित्त में होता सघन संताप है??
केशव मुझे बतलाईये, यह भेद भी समझाइए,
है तमच्छादित हर दिशा, मुझको सुपथ दिखलाइये।
।।40।।
श्री भगवानुवाच:
सुन मित्र तू वह कौन है, जो लक्ष्य नर का भ्रष्ट कर,
उसको गिराता पाप में, सब पुण्य उसका नष्ट कर।
जो जन्म देता काम को, जो पालता है क्रोध को,
जो सर्वदा कुंठित किया करता, मनुज के बोध को।
।।41।।
वो रजोगुण है, राजसी सुख चाहने वाला सखा,
जो भोग से भर बुद्धि को अति क्षीण है करता सखा।
जैसे कि जलती अग्नि को भी ढाँक लेता है धुआँ,
वैसे ही ढँकता ज्ञान को उत्पन्न ये विष काम का।
।।42।।
यह भी बड़ा विज्ञान है, जिस पर न तेरा ध्यान है,
ये इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सब ही, काम के प्रिय स्थान हैं।
इनको कर अपने वश, मनुज को काम संचालित करे,
इनके ही द्वारा काम नर के ज्ञान को खंडित करे।
।।43।।
अतएव, है नरश्रेष्ठ अर्जुन! तू प्रथम ये काम कर,
निज बुद्धि, मन, व इन्द्रियों पर विजय तू अविराम कर।
इस भाँति अपने ज्ञानहंता, काम का कर वध सखा,
सदपंथ पर चलकर, सुनिश्चित जीत अपनी कर सखा।
।।इति श्री कृष्ण अर्पणं अस्तु।।
।।तृतीयोध्याय सम्पूर्ण।।