कहानी जंग की सारी कहेंगे,
ये दीपक रात भर यूँही जलेंगे।
सियाही रात की सारी धुलेगी,
ये झरने रौशनी के जब बहेंगे।
अकेला दीप जब देगा चुनौती,
अंधेरे हाथ बस अपने मलेंगे।
ख़ुदा! इस नर्म दिल पे वार तीखे,
बता तू ही भला कब तक सहेंगे।
कभी तो चाँद बन के आओगी तुम,
कभी तो आशिक़ों के दिन फिरेंगे।
निशाने पे लगी है जान फिर भी,
क़दम अपने नहीं पीछे करेंगे।
मुहब्बत बस किताबों में बची है,
तेरे इस कौल को झूठा करेंगे।
ग़ज़ल कहने में यों तो मुश्किले हैं,
मगर कोशिश मुसलसल हम करेंगे।
किसी दिन ख़्वाब ये होगा मुक़म्मल,
ख़ुशी के फूल घर-घर में खिलेंगे।
सुबह की इंतजारी शाम से है,
कल उनसे हम बहाने से मिलेंगे।
अगर तुम हाथ थामे चल पड़ोगी,
नहीं हम ज़िन्दगी में फिर गिरेंगे।
ज़रा तुम छेड़ दो तो बात ही क्या?
ये नदिया, पेड़, भी बातें करेंगे।
तुम्हें देखा, खिले कुछ फूल दिल में,
जो मिलने आओ... बागीचे खिलेंगे।
तुम अपनी राह चलते जाओ प्यारे,
खड़े हर मोड़ पर हम ही मिलेंगे।
मुहब्बत का मज़ा है डूबने में,
गधे हैं क्या, जो हम इससे तरेंगे?
सुहानी शाम बन बैठो कभी तो,
सितारे माँग में उजले जड़ेंगे।
डरे हैं जब से शादी हो गई है,
वगरना, हम किसी से क्या डरेंगे??
-अंशुल तिवारी
धनतेरस/ 05.11.18/हरिद्वार।
(रंगोली: Vanshika Awasthi Tiwari)
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