हे राम!
सुना है आज,
तुम्हारी प्रतिमा भव्य बनेगी।
द्रुतगति से दावानल-सा,
ये समाचार हर ओर गया है।
भू स्थापित होगी प्रतिमा,
व्योम पर होगा शीष तुम्हारा।
हे राम! सुना है ये कि,
अवध में उत्सव होगा भारी।
गूँजेगी जयकार तुम्हारी,
आनंदित होंगे नर-नारी।
एक लक्ष्य हो, शासन सारा,
कमर कस रहा, करे तैयारी।
मंचों से ये हो उठी घोषणा,
झोंकेंगे हम शक्ति सारी।
मैं भी तो खुश बहुत हूँ,
मैं हूँ भक्त तुम्हारा।
हृदय परम् उत्साही है,
मन सोच का मारा।
सोच रहा हूँ, ये जो प्रतिमा बनवाते हैं,
ज़ोर-ज़ोर से नाम तुम्हारा चिल्लाते हैं।
क्या बनने के बाद भी तुमको याद रखेंगे?
क्या विराट प्रतिमा का किञ्चित ध्यान धरेंगे?
क्या कोई देखेगा इसपर धूल जमेगी?
किसी चौक पर निपट अकेली खड़ी रहेगी??
क्या पश्चात स्थापना के भी, कोई शीष नवाएगा??
या केवल बस देख इसे, दृग झुका चला वह जाएगा?
शुष्क सुमन क्या सजे रहेंगे? मस्तक पर रघुनन्दन के,
सूखे टीके लगे रहेंगे! क्या कुमकुम के, चन्दन के??
क्या चुनाव के बाद भी कोई तथाकथित जन नेता,
इसपर पुष्प चढ़ाने या,
मानस की पंक्ति सुनाने आएगा?
क्या कोई विषभरा शीष षड्यंत्र रचयिता,
श्रद्धा से भर जाएगा??
और नीचता तजे राम की चरण शरण में आएगा?
निर्वाचन उपरांत राम को कौन पूछता आएगा?
इस विराट प्रतिमा पर बलि-बलि जाएगा??
उत्सव कुछ दिन होगा, फिर सब जन स्मृति से हट जाएगा।
नकली ये आवरण भक्ति का, बहुत जल्द फट जाएगा।
दुख है ये, जिस परमपुरुष ने इस भारत में,
मर्यादा को परिभाषा दी।
थके हुए ,बोझिल नैनों को, भटके, व्याकुल,
लोगों को फिर आशा दी।
जिसने, नरता का जग में आदर्श दिया था,
जिसने जन कल्याण हेतु ही कष्ट सहा था।
जिसने अपने चरणों से,
पाषाण हुई गौतम पत्नी को,
मुक्त किया था, शुद्ध किया था।
आज उसे ही क्षुद्र लाभ हित,
तुम पत्थर में, बांध रहे हो।
अति विराट रघुकुल भूषण को,
सीमित कद में साध रहे हो!!
जिस दिन तुम प्रतिमा बनवा कर,
मर्यादापुरुषोत्तम को पत्थर में चुनवा कर।
हिन्दू गौरव, दम्भ वेदी पर बली चढ़ाकर।
कर्मकांड से प्राण प्रतिष्ठा करवाओगे,
जग को अपनी भक्ति कदाचित दिखलोगे।
स्मरण रखो ये,
राम नहीं आएँगे, इस प्रतिमा में रहने,
राम न आएँगे किञ्चित अन्याय ये सहने।
राम न ठहरेंगे विराट इस छत्र के नीचे,
राम चले जाएँगे, अपनी आंखें मीचे।
राम चले जाएँगे, शबरी की कुटिया में,
नहीं रहेंगे इस सत्ता लोलुप दुनिया में।
अरे राम के भक्तों! अपनी आँखें खोलो,
नहीं राष्ट्र आदर्श ज़रा, सत्ता से तोलो।
सुनो राम के भक्त तभी कहलाओगे,
जब निरीह, निर्धन को गले लगाओगे।
-अंशुल।
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