अजीब आदमी है वो....
बातें भी अजीब करता है!
बेगाना, बेपरवाह,
अलमस्त अपनी दुनिया में!
कभी उसकी बातें सुनकर,
लगता है,
उसने चाँद को देखा है,
बातें करते,
सड़कों पर टहलते,
छत पे चलते,
दरीचे से झाँकते,
छज्जे से ताकते!!
वो सबसे यही कहता,
लोग मान भी लेते हैं,
उसकी बात!
अजीब आदमी है वो....
लगता है उसने,
सुनी है हवा की बोली!
वो पढ़ लेता है,
क्या लिखा है, हवा के आँचल पे,
कोई नाम, कोई पैग़ाम!
फिर, चुपके से पढ़कर,
रख लेता है अपने सन्दूक में।
और, हवा को,
छोड़ देता है,
अपनी गिरफ़्त से!!
अजीब आदमी है वो....
लगता है उसकी मुंडेर पर,
जो डिब्बे रखे हैं,
उनमें रखी है उसने,
धूप, बारिश, फ़ुहारें, बौछार,
बर्फ़, शबनम, पतझर, बहार।
सुना है, वो जब जी चाहे,
मौसमों को आज़ाद कर देता है।
खेलता है उनसे, जी भर कर।
और फिर क़ैद कर लेता है।
अजीब आदमी है वो....
लगता है, वो जानता है,
जादू-टोना भी।
सुना है,
उसने भर रखी है,
एक इठलाती, बलखाती,
गुनगुनाती, मुस्कुराती नदी,
खिड़की के पास रखे घड़े में।
वो जब चाहे उसे छेड़ता है,
बहाता है, जी भर नहाता है।
अजीब आदमी है वो....
लगता है, वो समझता है,
पंछियों की भाषा भी,
मैंने देखा है उसे,
गोरैया से बतियाते,
तितलियों संग खिलखिलाते,
पेड़ों, फूलों से गप्पें लड़ाते।
अजीब आदमी है वो....
लगता है,
उसे आती है उड़ने की कला,
वह जब चाहे, किसी बादल को,
पकड़कर, उड़ चलता है।
सुदूर, अनन्य लोकों की सैर पर!
बादलों पर उड़कर यहाँ से वहाँ,
वो देख चुका है, ये दुनिया!!
और किसी अन्वेषक की तरह,
लिख देता है जो देखा है!!
सुना है, वो सब कुछ जानता है!!
सच में,
अजीबआदमी है वो....
पर उससे अजीब ये बात है!
कि, जो दिन में इतना कुछ,
कर जाता है!
कौतूहल रच जाता है!
असंभव, अकल्पित को,
परिभाषित कर जाता है।
शाम ढलते ही न जाने,
उसे क्या हो जाता है?
आज शाम ढलते ही,
मैंने उसे देखा...
वो चुपचाप, अकेला,
एक खाट की गोद में,
थककर सो जाता है!
काग़ज़ पर कुछ लिखता-लिखता,
खो जाता है।
मुझे नहीं पता ये कौन है??
ये,
ख़ुद को कवि बतलाता है।
- अंशुल तिवारी।
हरिद्वार/ 28.11.18
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