बन्दे ने शिकायत की, ऐ पीर! ऐ ख़ुदाया!
मैंने दुआएँ मांगी, क्या क्या नहीं लुटाया?
लेकिन जवाब उनका आख़िर तू दे न पाया,
कहता रहा कि दूँगा, ये हौसला दिलाया,
आये थे जो गए सब, मैं ही रहा बकाया,
पर आरज़ू जो थी वो, पूरी क्यूँ कर न पाया?
इतने सवाब मैंने जो कर रखे थे उनके,
बदले में मुझको तूने बस आदमी बनाया??
(सवाब: पुण्य)
-अंशुल।
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