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Monday, 14 August 2017

छलावा

रात गए,
कुछ ख़याल आ गए,
बस बेखटके,
बिना कहे कुछ,
अनचाहे मेहमानों जैसे।

आ धमके कमरे में मेरे,
धरना देकर बैठ गए फिर।

मैं तो बस सोने वाला था,
नींद में जा खोने वाला था।
दिनभर की सब दौड़-भाग,
और उठा-पटक से बचकर, छुपकर।
थके, परेशाँ चहरे को, अंधियारे से,
धोने वाला था।

लेकिन इन कम्बख्तों ने,
पुरज़ोर कोशिशें करके,
मुझको जगा दिया।

पास आ रही निद्रा, को भी भगा दिया।

मैं भी उठा, तैश में आया,
आज क़ैद कर लूँगा इनको,
सोच के काग़ज़ क़लम उठाया।

लेकिन तब ये मैंने पाया......

ख़याल मुझे फिर चकमा देकर चले गए थे,
बेक़सूर, हम रोज़ की तरह छले गए थे।

अब कमरे में मैं था, काग़ज़ क़लम वहीं थे,
निद्राहीन नयन थे, लेकिन शब्द नहीं थे।

- अंशुल तिवारी।
11.05.2017

धर्मसार

"दुनिया में धार्मिकों की कमी नहीं ग़ालिब" (व्यंगात्मक रूप से),
शायद ये मिसरा मौजूद हालात में अत्यधिक उपयोगी साबित हो सकता है।
जहाँ देखो धर्म विषयक चर्चाएँ, प्रवचन, उपदेश हैं।
किन्तु क्या धर्म यही है जो हम आप देख रहे हैं, या कदाचित है तो भी धर्म का पूर्ण स्वरुप नहीं है।
अपनी अल्पमति के अनुसार एक प्रयास, कुछ विचार अभिव्यक्त करने का.....(त्रुटियों हेतु क्षमायाचना)...

भीड़ में रह या मंचों पे चढ़ बस चिल्लाना,
धर्म नहीं है।
अपने पुरखों की थाती पर बस इतराना,
धर्म नहीं है।
बीते कल की बेड़ी पहने चलते जाना,
धर्म नहीं है।
अपनी कहना-सुनना, बस अपनी सुनवाना,
धर्म नहीं है।

बिन समझे ही स्वयं, सार जग को समझाना,
धर्म नहीं है।
भाँति भाँति के तर्कों से सबको बहलाना,
धर्म नहीं है।
निज जन की ही सुनना, और 'पर' को हड़काना,
धर्म नहीं है।
देश, काल को ताक पे रख, निर्णय कर जाना,
धर्म नहीं है।

धर्म नहीं है यह केवल कि,
एक ही पक्ष सुनाई दे।
देखो जिस भी ओर भले,
बस एक ही रंग दिखाई दे।

धर्म धीरता का प्रतीक है,
और धारण की शक्ति है।
संयम, नियम, प्राण हैं जिसके,
मानवता ही भक्ति है।

धर्म मनुज के लिए बना है,
मनुज धर्म के लिए नहीं।
भूल इसे अनगिनत बार,
क्या क्या अघ हमने किए नहीं।

मानवता को भूल गए,
हम भूले वसुधा है कुटुंब।
किन्तु धर्म ही याद रहा,
जिससे प्रगाढ़ हो गया दंभ।

धर्म वही जो मानव को,
मानव होना सिखलाए।
एक दूसरे के प्रति जो,
सौहार्द भाव उपजाए।

धर्म वही जो दे समाज को,
नर परहित अनुगामी।
हरिश्चंद्र से व्रतपालक,
शिवि, रघु, दधीचि से ग्यानी।

राम नाम ही नहीं,
राम से नर को प्रकट करे जो।
केवल बातें नहीं अपितु,
निज सुख को होम करे जो।

बने प्रेरणा, निश्छल हो जो,
कपट, खोट न जाने।
जन मंगल की इच्छा ही,
जो सबसे ऊपर माने।

ऐसा धर्म रहा तो वसुधा,
देव धाम सी होगी।
सुख, समृद्धि से भरी,
नयनाभिराम सी होगी।

अतः, समय है यह विचार,
निश्चित अपनाया जाए।
मानवता आधार हो,
ऐसा धर्म चलाया जाए।

- अंशुल तिवारी।

Sunday, 30 July 2017

तुम्हारा साथ...

तुम्हारा साथ है,
जैसे भरोसा,
भरोसा जो भी होगा,
ठीक होगा।।

तुम्हारा साथ है,
जैसे दिलासा,
दिलासा ये कि मंज़िल,
मंज़िल पास होगी।

तुम्हारा साथ है,
मंदाकिनी-सा,
भरी है जिसमें शीतलता,
अनोखी।

तुम्हारा साथ है,
तारावली-सा,
प्रकाशित जिससे जीवन,
का ये पथ है।

तुम्हारा साथ है,
गीतावली-सा,
है गुंजित गीत-सा हर,
शब्द जिसका।

तुम्हारा साथ है,
जीवन का संबल,
है मुश्किल राह भी,
आसान जिससे।

- अंशुल।।

Friday, 7 July 2017

वक़्त चलता है...

वक़्त चलता है ,साथ उसके यूँ चलते रहिए,
ख़ुद ही ख़ुद के लिए, ख़ुद को भी बदलते रहिए।।

ज़िन्दगी जो भी है, ये आप सँवर जाएगी,
कोशिशें कीजिए, बस कोशिशें करते रहिए।।

एक ही है उसूल बस के यहाँ जीने का,
मंज़िलें पा के, नई राहों पे चलते रहिए।।

ढल न पाए जो ज़िंदगी तुम्हारे साँचे में,
क्या बुरा है कि ख़ुद ही साँचे में ढलते रहिए।।

राह आसान नहीं है तुम्हारे वास्ते तो,
चलते रहिए, न कि घबरा के यूँ टलते रहिए।

- अंशुल।।

अपनी कश्ती को न लहरों के हवाले रखिए!!

अपनी कश्ती को न लहरों के हवाले रखिए,
अपने हाथों में ही पतवार सम्भाले रखिए।।

आंधियाँ जिनको बुझाने में भी नाकाम रहें,
दिल में रोशन ज़रा कुछ ऐसे उजाले रखिए।।

एक अर्से से है तूफ़ान की दस्तक़ दर पर,
हौसला रखिए, यूँ न होठों पे नाले रखिए।।

चैन हर ओर है, राहों में बाहर आई है,
आज के दौर में ये ख़्वाब भी पाले रखिए।।

- अंशुल।।

Saturday, 18 February 2017

एक बेटी की बिदाई के सन्दर्भ में....

एक बेटी की बिदाई के सन्दर्भ में....

खिलौने छीनकर अपने यूँ दौड़ती है अभी,
वो है बयार-सी जैसे, कहाँ हुई है बड़ी?

आँगन को सजाती है रंगोली बनकर,
गूँजती घर में वो सारे ठिठोली बनकर।

दीयों में रहती है घर के वो रौशनी बनकर,
छिटकती है वो झरोखों से चाँदनी बनकर।

घर सर पे उठाती है वो तूफ़ान की तरह,
छाई रहती है ज़ेहन पे वो आसमाँ की तरह।

आँखों में वो बसती है यूँ अरमाँ बनकर,
दिलों में रहती हमारे वो जैसे जाँ बनकर।

जहाँ में आई वो जैसे मेरी पहचान बनकर,
कहाँ वो चल पड़ी है आज यूँ  मेहमाँ बनकर।

जो है दुआओं भरा दिल, वो लिए जा रही है,
नया जहान, नई ज़िन्दगी बुला रही है।

ख़ुशी के फूल उसकी राह में खिलते ही रहें,
कारवाँ जश्न के हर मोड़ पे मिलते ही रहें।

- अंशुल।

Tuesday, 6 December 2016

जब चुप था...

मैं चुप था,
तब तक अच्छा था।
जब बोल पड़ा,
तो बुरा हुआ।
पर मेरा इसमें दोष नहीं,
तुमने ज़िद की,
मुझसे बोले,
जो बात है दिल में,
साफ़ कहो।

मैं कह दी,
तुम सह न सके।
मुँह फुला के मुझसे रूठ गए।
अब मैं बोला,
क्यूँ रूठे हो?
तो बोले,
बड़े बुरे हो तुम।

इससे पहले ही अच्छे थे,
इतना कहकर तुम चले गए,

मैं खड़ा-खड़ा सोचता रहा,
जब चुप था तब ही बेहतर था।

-अंशुल तिवारी।