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Monday, 14 August 2017

छलावा

रात गए,
कुछ ख़याल आ गए,
बस बेखटके,
बिना कहे कुछ,
अनचाहे मेहमानों जैसे।

आ धमके कमरे में मेरे,
धरना देकर बैठ गए फिर।

मैं तो बस सोने वाला था,
नींद में जा खोने वाला था।
दिनभर की सब दौड़-भाग,
और उठा-पटक से बचकर, छुपकर।
थके, परेशाँ चहरे को, अंधियारे से,
धोने वाला था।

लेकिन इन कम्बख्तों ने,
पुरज़ोर कोशिशें करके,
मुझको जगा दिया।

पास आ रही निद्रा, को भी भगा दिया।

मैं भी उठा, तैश में आया,
आज क़ैद कर लूँगा इनको,
सोच के काग़ज़ क़लम उठाया।

लेकिन तब ये मैंने पाया......

ख़याल मुझे फिर चकमा देकर चले गए थे,
बेक़सूर, हम रोज़ की तरह छले गए थे।

अब कमरे में मैं था, काग़ज़ क़लम वहीं थे,
निद्राहीन नयन थे, लेकिन शब्द नहीं थे।

- अंशुल तिवारी।
11.05.2017

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