hamarivani badge

a href="http://www.hamarivani.com/update_my_blogg.php?blgid=4653" target="_blank">www.hamarivani.com

Wednesday, 22 August 2018

श्री अटल जी का स्मरण

तुम विदा हुए हो सृष्टि चक्र से,
मन से कैसे जाओगे??
इस भारत भू से विलग हुए,
जन-गण से कैसे जाओगे??

तुमने तो पाई अटल स्तिथि,
गति पाई जो पाए योगी।
लेकिन सोचो ये बिना तुम्हारे,
यहाँ परिस्तिथि क्या होगी??
इन आकुल-व्याकुल नैनों को,
अब त्राण कौन दे पाएगा?
तुम जैसा धरतीसुत धरती,
पर अब शायद ही आएगा??

तुम मुक्त हुए, तुम दूर हुए,
जन-मन से कैसे जाओगे??

तुम थे, तो थी ये आस अटल,
तुम से जय का विश्वास अटल!
तुम नीति नियम के साधक थे,
जन के हित के आराधक थे!
तुम शक्ति-शांति के अनुगामी,
मैत्री सन्देश के वाहक थे।
हे! भीष्म प्रतिज्ञा के पालक,
जन सुख सरिता के संचालक!!

तुम स्थूल रूप में विलग हुए,
चेतन से कैसे जाओगे?? (चेतन मन के संदर्भ में)

हे त्याग! तपस के मूर्त रूप,
हे लोकमान्य! हे पितृरूप!!
हे विद्या, विनय, विवेकवान!
हे! अटल, अडिग, मानव महान!!
हे स्वाभिमान के अनुयायी,
दे रिपु को भी जो अभयदान!
करुणावादी, आदर्शवान,
भारत भू की तुम आन ,बान!

अपने आराध्य राष्ट्र भारत के,
प्रण से कैसे जाओगे??

कविताई के अप्रतिम शिखर,
हे ज्ञानवान! विद्वान प्रखर।।
जन-जन के तुम नेता निश्छल,
निष्ठावादी, तुम अटल, सबल।
वसुधा को ही परिवार मान,
निज सुख को था कर दिया दान।
हे शिवि, दधीचि के अनुगामी,
हे विद्यानिधि! उद्भट ज्ञानी!

ये धरती तुम्हें बुलाती है,
तव सुमिरन में अकुलाती है।
जो भी विधिना का हो विधान,
हमको बस है इतना ही ज्ञान।
तुम सदा रहोगे हर मन में,
भारत माता के कण-कण में।
निष्ठा सेवा के हर प्रण में,
कविता की प्रेरक गुंजन में।

हे कवि! बोलो तुम श्रोता के,
वंदन से कैसे जाओगे??

तुम मुक्त हुए, तुम दूर हुए,
जन-मन से कैसे जाओगे??

-अंशुल तिवारी।

Sunday, 19 August 2018

श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भावांजलि

कौन है जिसके लिए,
आकाश है काँधा झुकाए।
कौन है जिसके लिए,
सहमी खड़ी हैं दिग-दिशाएँ।
कौन है जिसके लिए,
धरती थमी सी लग रही है।
कौन है जिसके लिए,
मन में कमी सी लग रही है।
कौन है जिसके लिए,
प्रत्येक जन है धीर खोता,
कौन है जिसके लिए,
व्याकुल नयन हैं, मन है रोता।

कौन है जिसके लिए,
पहिया समय का रुक गया है।
कौन है जिसके लिए,
हर एक मस्तक झुक गया है।
कौन है जिसके लिए,
श्रद्धाविनत संसार है ये।
कौन है जिसके लिए,
सम्मान के उपहार हैं ये।
कौन है जिसके लिए,
दिल में जगह सबके बनी है।
कौन है जिसके लिए,
सबकी विधाता से ठनी है।

कौन है जिसके लिए,
उपमाएँ भी लज्जित खड़ी हैं।
कौन है जिसके लिए,
संज्ञाएँ सब छोटी पड़ी हैं।
कौन है जिसके लिए,
है स्वर्ग भी पलकें बिछाए।
कौन है जिसके लिए,
बाँधे स्वयं को है हवाएँ।
कौन है जिसके लिए,
है शत्रुओं की आँख भी नम।
कौन है जिसके लिए,
जन त्याग निजता हो गए हम।

कौन है जिसके लिए,
सुरलोक में उत्साह अविरल।
कौन है जिसके लिए,
सीधी वहाँ की राह निर्मल।
ये नहीं है और कोई,
भारती का सुत अलौकिक।
जो जिया शालीनता से,
धर्म के पथ पर चतुर्दिक।
था सदा जिसके कथन पर,
सिर सभी ने ही झुकाया।
जिसने अपने नेह से,
जन-जन को था अपना बनाया।

जिसने दृढ़ संकल्प कर यूँ,
पाठ दृढ़ता का पढ़ाया।
विश्व में माँ भारती का,
मान, गौरव था बढ़ाया।
जिसने हरदम मित्रता का,
राग अरिसम्मुख था गाया।
और जग में भारती की,
शक्ति का परचम उठाया।

जिसने संघर्षों के पथ से,
जी कभी था न चुराया।
बढ़ सघन अंधियार में भी,
शांति का दीपक जलाया।
जिसने उत्तम नीति का नव,
पंथ दुनिया को दिखाया।
शत्रुता को जीतने के,
हेतु पहला पग उठाया।

हाय! कैसा दिन?? के लो,
वो जा रहा है, जा रहा है!!
स्वर्ग के देवों सुनो वो!
आ रहा है, आ रहा है!!
हे विधाता! क्या तुझे भी,
आज है उसकी ज़रूरत।
शांति और शक्ति की मिश्रित,
जो अलौकिक दिव्य मूरत।

आज माता भारती की,
आँख भी नम हो गई है।
गिनती उसके वीर पुत्रों,
की पुनः कम हो गई है।
क्या करें हम, कुछ न सूझे,
कुछ नहीं आता समझ है।
पर विधि की कल्पना पर,
चल सका किसका ही वश है।

हो नमन स्वीकार तुमको,
ओ यशस्वी! ओ चिरन्तन!
हम सभी करबद्ध होकर,
कर रहे मनपूर्ण वंदन।
तुम पुनः आओ, के भारत,
को तुम्हारी है ज़रूरत।
तुम से ही उज्ज्वल, धवल है,
भारती की दिव्य मूरत।

है यकीं हमको न तुम ये,
भूमि तज कर जा सकोगे।
भारती के स्नेह को तज,
कर नहीं तुम जा सकोगे।

- अंशल तिवारी।

Tuesday, 24 July 2018

ग़ज़ल कहना नहीं आसान

ग़ज़ल कहना नहीं आसान प्यारे,
बड़ा मुश्किल है इम्तेहान प्यारे।

लगाओ दम, अगर है दम तो देखो,
निकल आएगी इसमें जान प्यारे।

भला यूँ दिल्लगी में इस तरह मत,
यहाँ ख़ुद को करो क़ुर्बान प्यारे।

ये है दरिया के जिसमें आग ही है,
ये खेल इतना नहीं आसान प्यारे।

यहाँ दुश्वारियाँ हैं हर कदम पर,
तुम्हें जिनकी नहीं पहचान प्यारे।

बस अपना हौसला हिम्मत न हारो,
यही हैं जीत के इमक़ा प्यारे।

ज़हन मासूमियत लबरेज़ रक्खो,
बुलंदी पर रखो ईमान प्यारे।

ग़ज़ल में जल्दबाज़ी ही मना है,
ज़रा सा रखो इत्मीनान प्यारे।

- अंशुल तिवारी।

Thursday, 19 July 2018

नादान

रंग ओ नस्ल का देके हवाला शख़्स यहाँ,
वो जो इंसान को इंसाँ से जुदा कहते हैं।
उनसे बेहतर हैं वो नादान जो नादानी में,
सर झुका अदब से, पत्थर को ख़ुदा कहते हैं।

-अंशुल।

Sunday, 17 June 2018

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

महाप्राण, राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर जी की पुण्यतिथि (24.04.1974)
पर उन्हें भावांजलि और उनका पुण्य स्मरण।

दिनकर तुमको शत बार नमन....

हे! शब्दब्रह्म के नित साधक,
मानव के हित के आराधक।

हे! गिरातनय, हे! वाणीसुत,
दैवीय तेज के हे! वाहक।

ख़ुद समय बोलता था लेकर,
तव शब्दावलि का अवलंबन।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

हे महातपस्वी!, तेजपुंज,
साहित्य कला के हे निकुंज!

मानव समाज जब हीन बना,
तुम उभरे बनकर शक्तिपुंज।

नर का सुषुप्त अभिमान जगा,
था दैन्य भाव का किया दमन।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

वीरत्व, प्रखर स्वर परम घोर,
निःसीम ज्ञान, बिन ओर छोर।

अद्भुत प्रतापमय, वाणी ज्यों,
ले स्वयं महासागर हिलोर।

जन गण,को समझाया तुमने,
है तुच्छ हीनता का जीवन।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

राधेय कभी बनकर बोले,
बन कृष्ण ज्ञान के पट खोले।

कुरुकुल के कभी पितामह बन,
कर्तव्य भेद तुमने खोले।

अगणित रचनाओं से हमको,
फिर करवाया इनका दर्शन।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

संघर्षशील जीवन जीकर,
विष सदा विषमता का पीकर।

शिवरूप बने तुम नीलकण्ठ,
जन-जन का क्षत मानस सीकर।

इस परम गरल को अनल बना,
दुष्टों के हित फिर किया वमन।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

तुम अटल, अचल हो महासूर्य,
मृत मानव के जयघोष तूर्य।

कविता नभ के हे विवस्वान!
देदीप्यमान! हे तेजवान!!

हे मित्र ! निराले जन-जन के,
हे शुभचिंतक! इस जन-गण के।

हे राष्ट्रभक्त!  हे ज्ञाननिधि!
अविजित योधा जीवन रण के।

हे शब्दपुरुष! हे अजर अमर!
साहित्य धरा के परम शिखर।

तम युक्त जगत को दे प्रकाश,
टूटे मन में उपजाई आस।

इस अतुल अलौकिक भेंट हेतु,
स्वीकार करो ये अभिनंदन।

हममें इतना सामर्थ्य कहाँ??
कुछ सोच लिखें या कह पाएँ!

केवल मन से छू सकते हैं,
तव शुभ्र, अलौकिक , दिव्य चरण।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

- अंशुल।

Sunday, 27 May 2018

श्री हनुमतवंदनाष्टक

।।हनुमंत वंदना।। (अष्टक)
1.
केसरी किसोर, जाके बल को न ठौर कोई,
ऐसो रखवार तज और कहाँ जाईए।।
अशरण शरण औ' करुणा निधान राम,
दास के चरण में ही मन को लगाईए।।
लोक को सँवार, परलोक भी बनाए देत,
साहिब सुजान हनुमान को मनाईए।।
नीति-रीति, विधि के विधान में न उलझिये,
छल-बल त्याग बस राम राम गाइये।।

2.
जाको सुमिरन दुःख दुसह दरिद्र हरै,
नाम लेत संकट सकल मरि जात हैं।।
जिनकी हुँकार से, त्रिलोक होत कंपित व,
नीच असुरों के दुष्ट दल भय खात हैं।।
राम का आसीस जाके सीस नित सोहत है,
सम्भव, असम्भव को क्षण में बनात हैं।।
साधुजन रच्छक हैं, दुष्ट गण भच्छक हैं,
राम को गुलाम, "महावीर जी" कहात हैं।।

3.
खेल-खेल माँहिं छाती, गगन की चीर कर,
हाहाकार अंतरिक्ष, जाय के मचाए हैं।।
भूख लगने पे दिनकर को समझ फल,
जगत प्रकाशक को मुख में छिपाए हैं।।
वेद जाको जयगान, गावत हैं नेति-नेति,
देव नत-शीष जाकी शरण में आए हैं।।
अंजनी के लाल जाकी, महिमा बिसाल अति,
भक्त हितकारी सब, जग में कहाए हैं।।

4.
तेज अनुपम गुण, जिनके अलौकिक हैं,
शारद व शेष पार जिनका न पाए हैं।।
हार गए ढूँढ-ढूँढ, थक गए लिख-लिख,
जेते ज्ञानवान इस, जग में कहाए हैं।।
चौदह भुवन, नभ, धरती, पताल सब,
देख-देख, छान-छान, हाय पछताए हैं।।
बुधि-बल, ज्ञान में समान, हनुमान जी के,
दूसरा न कोई यह, दृग देख पाए हैं।।

5.
एकही छलांग में जी लांघि महासागर को,
शत-योजनों को गऊ-पद सा बनाए हैं।।
जिनका प्रचंड वेग और अतिबल देख,
जल, थल, नभचर सब घबराए हैं।।
रामकाज साधने में, देर न लगाए राम-,
-बाण सम वेग धारि, हनुमत धाए हैं।।
जेते वेगवान सब, जानत जहान आज,
काल, मन, पवन, सकल ही लजाए हैं।।

6.
रामजी को दूत बन, मसक सों रूप धर,
रामजी की जय बोल कपि जी सिधारे हैं।।
द्वार पे ही लंक के जो, लंकिनी ने रोक लिया,
मुठिका प्रबल हनुमान, तब मारे हैं।।
सीय सुधि ज्ञात कर, अवसर साधकर,
मारि-मारि, फेंक-फेंक, असुर संघारे हैं।।
तिनको के ढेर सम, स्वर्ण पुर फूँक दियो,
कूद-कूद इत-उत, लंका सब जारे हैं।।

7.
ऐसो अतुलित बल, आपने दिखायो फिर,
लौट रघुनाथ जी के, चरणों में आए हैं।।
बीर बिकरम ज्ञान, गुण में प्रथम आप,
रामजी को दास कहलात सुख पाए हैं।।
परम् विनीत गुणवान हनुमान जैसा,
योधा तिहुँ लोक में न, और कोई पाए हैं।।
युद्ध में प्रबुद्ध, सन्त परम् विशुद्ध, हिय,
प्रेम की अनोखी गंगधार को समाए हैं।।

8.
आशुतोष शंकर को, अंश हनुमान राम,
काज साधने के हित लीन्ह अवतार हो।।
अंजनी के लाल महाकाल दुष्टजन हेतु,
निज जन हेतु प्रेम सागर अपार हो।।
दास कहे जोरि पाणि, संकट सहाय होवो,
नाव फँसी नाथ मेरी, बीच मझधार हो।।
और का भरोस मोहे कछु नहिं नाथ मेरे,
रखवार आप बस, अंजनीकुमार हो।।

।।श्री हनुमतवंदनाष्टक सम्पूर्ण।।
।।श्री रामार्पणमस्तु।।
।।जै जै सिया राम, जै जै हनुमान।।

-अंशुल।।

Thursday, 3 May 2018

लम्हे!!

समय से चुराकर,
समय से बचाकर।
उठा लो ये लम्हे,
छुपा लो ये लम्हे,
ये लम्हे वही हैं,
जो जुड़कर बनेंगे,
हमारी कहानी के किस्से सुहाने।
इन्हें चुन के रखलो,
ये हैं फूल जिनसे,
महकते रहेंगे सभी दिन पुराने।
यही याद के हैं वो,
बेमोल मोती,
पिरोकर जिन्हें हम सजाएँगे जीवन।
इन्हीं के सहारे बिताएँगे जीवन!!
ये लम्हे नहीं सिर्फ़,
कतरा समय का!!
ये लम्हे तो हैं ज़िन्दगी की निशानी,
इन्हीं से बनी है, इन्हीं से बनेगी,
ज़रा और बेहतर-सी ये ज़िंदगानी।
तुम्हारी-मेरी दास्ताँ,
जो भी होगी,
यही रंग बनकर निखर जाएँगे फिर।
अगर खो गए,
तो बिखर जाएँगे फिर।
उठा लो ये लम्हे,
चुरा लो ये लम्हे।
नहीं पर  ये आसाँ,
ज़रा है ये मुश्क़िल,
जो हो साथ तेरा,
तो मिल जाए मंज़िल!!

-अंशुल।।