(चिट्ठियाँ महज़ कागज़ का एक टुकड़ा नहीं होतीं, कभी कभी जीने का सहारा भी होती हैं.
मगर वक़्त बड़ा बेरहम है, कमबख्त खुद बढ़ता है तो औरों की कीमत घटा देता है (समय के साथ चीज़ों का महत्त्व कम हो जाता है).
पर जज़्बात से मजबूर इंसान कीमत घटने के बाद भी गले से लगाए रखता है यादों को/ चिट्ठियों को.
एक ख़याल समर्पित, किताबों के पन्नों के बीच दम तोड़ती और एक अर्से से सम्भाल कर रखी गई उन चिट्ठियों को...)
उम्र कहाँ लंबी होती है काग़ज़ की,
कभी गल जाता है और
मिट जाती है स्याही भी आँखों के पानी से।
कभी गल जाता है और
मिट जाती है स्याही भी आँखों के पानी से।
कभी सुलग उठता है, हथेली की गर्मी से।
या कभी यूँही ज़ाया हो जाता है ,
कटकर, टुकड़े-टुकड़े होकर।
कटकर, टुकड़े-टुकड़े होकर।
सुनो,
यहाँ हर नज़र समेटे हुए है, न जाने कैसी आग।
जिसके आगे भाप बनकर उड़ जाएँगे अल्फ़ाज़ तुम्हारे।
यहाँ हर नज़र समेटे हुए है, न जाने कैसी आग।
जिसके आगे भाप बनकर उड़ जाएँगे अल्फ़ाज़ तुम्हारे।
और काग़ज़, जिसे तुम मानकर बैठे हो अपना संसार,
बस, राख हो जाएगा देखते देखते।
बस, राख हो जाएगा देखते देखते।
-अंशुल तिवारी।
