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Monday, 24 October 2016

सफ़र...

(नसीहतें काम आती हैं, लेकिन बेवजह दी जाएँ तो केवल उलाहना लगती हैं.
यदा-कदा हमें भी ऐसे लोग मिल जाते हैं जो शायद सफ़र-ए-मंज़िल की दुश्वारियों से वाकिफ़ नहीं हैं लेकिन फिर भी नसीहतें देने का लोभ छोड़ नहीं पाते... प्रस्तुत संबोधन उनसे....)
उगेगा फिर वो सूरज, जो बुझा था कल समंदर में,
के मंज़िल तक पहुँचने का सफर, ये रोज़ होता है.

वाबस्ता इस किस्से से दुनिया की किताबें हैं,
गुज़रता पर जो है इस से, वो बस ख़ामोश होता है.
जो पाता और खोता है, यहाँ पर रोज़ मंज़िल को,
कहे वो क्या शिकस्तों से, हमेशा दोज़ होता है.
नसीहत बन सहारा रास्ते का चल नहीं पाती,
के बस राही  के काँधों पर सफ़र का बोझ होता है.

- अंशुल तिवारी

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