इतने क़िस्से, इतने सपने,इतनी बातें,
तुम,
कैसे, किधर, कहाँ रखती हो???
तुम,
कैसे, किधर, कहाँ रखती हो???
क्या, इन छोटी-सी आँखों में??
पलकों के किवाड़ लगाकर,
सब सहेजकर रखती हो।
पलकों के किवाड़ लगाकर,
सब सहेजकर रखती हो।
और, बनाती हो उनसे तुम,
अपना एक अलग ही बादल।
अपना एक अलग ही बादल।
फिर,
आकुल-व्याकुल मुझसे मिलकर,
बिन देरी के, पलक झपकते।
मुझ पर बरसाती हो जाने,
कितने क़िस्से, कितने सपने, कितनी बातें।
कितने क़िस्से, कितने सपने, कितनी बातें।
मैं नख-शिख तक भीगा तुमसे,
ठगा खड़ा सुनता रहता हूँ।
ठगा खड़ा सुनता रहता हूँ।
और तभी लग जाती हो तुम,
पुनः संजोने, क़िस्से, सपने, बातें.....।
पुनः संजोने, क़िस्से, सपने, बातें.....।
- अंशुल तिवारी, पुणे।
16.10.2016
16.10.2016
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