आईना।
मेरी दीवार की,
खूंटी पर टंगा है।
एक पुराना-सा, आईना।
खूंटी पर टंगा है।
एक पुराना-सा, आईना।
लकड़ी की गली हुई फ़्रेम में सजा।
न जाने कितनी सदियाँ देख चुका है।
न जाने कितनी सदियाँ देख चुका है।
मैंने पहली बार इसे देखा था,
बाबा के सामान में।
बाबा के सामान में।
उनका बड़ा ख़ास था,
हर जगह उनके साथ ही जाता।
हर जगह उनके साथ ही जाता।
अक्सर,
इस आईने से मेरा सामना होता।
जब बाबा दाढ़ी बनाते।
इस आईने से मेरा सामना होता।
जब बाबा दाढ़ी बनाते।
मैं बड़ा हैरान होता देख इसे,
और, परेशान होता सोच-सोच कर।
और, परेशान होता सोच-सोच कर।
कि, बाबा कहाँ से लाए इसको??
कौन बैठा है इसमें??
कौन बैठा है इसमें??
मैं एक ही हूँ, फिर आईने में दिखने वाला
ये दूसरा कौन है??
ये दूसरा कौन है??
दिन भर घिरा रहता मैं ऐसे कई,
झाड़ियों जैसे सवालों में।
झाड़ियों जैसे सवालों में।
पर, हल नहीं पता।
उलझता चला जाता।
फिर,
समय बीता, सब कुछ बदला।
हालात बदले, ख़्यालात बदले।
उलझता चला जाता।
फिर,
समय बीता, सब कुछ बदला।
हालात बदले, ख़्यालात बदले।
मैं भी काफी बदल गया।
पर, ये आज भी वैसा ही है।
पर, ये आज भी वैसा ही है।
हाँ उम्र की कुछ झाईयाँ,
इसके चेहरे पर उभर आई हैं।
इसके चेहरे पर उभर आई हैं।
पर न तो इसकी तासीर बदली है,
न ही इसकी तदबीर।
न ही इसकी तदबीर।
जहां मैं सीख गया तरक्की के नाम पर,
झूठ बोलना, दुनिया से, भगवान् से, अपने आप से भी।
झूठ बोलना, दुनिया से, भगवान् से, अपने आप से भी।
वहीँ,
आज भी किसी सुधारक की तरह,
मूक वैरागी की तरह।
आज भी किसी सुधारक की तरह,
मूक वैरागी की तरह।
किसी कर्मयोगी के तरह।
ये दिखा रहा है लोगों को सच।
ये दिखा रहा है लोगों को सच।
उनका सच,
जिसके अस्तित्व को वे नकार चुके हैं।
जिसके अस्तित्व को वे नकार चुके हैं।
मुझे यकीन हुआ अब की क्यों था ये,
बाबा का चहेता।
बाबा का चहेता।
और, इसीलिए शायद मैं देख सकता हूँ,
उनका चेहरा आज भी इसमें साफ़ साफ़।
उनका चेहरा आज भी इसमें साफ़ साफ़।
- अंशुल तिवारी।

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