hamarivani badge

a href="http://www.hamarivani.com/update_my_blogg.php?blgid=4653" target="_blank">www.hamarivani.com

Sunday, 23 October 2016

कविता...

(कविता के सन्दर्भ में विचार... 
कविता कहाँ रहती है? कहाँ से आती है? कैसी आती है?
यह जानना तो संभव नहीं है, फिर भी एक छोटा-सा प्रयास इन प्रश्नों का उत्तर खोजने का... )


चट्टानों का हृदय चीरकर,
ज्यों उग आता है नव अंकुर।
उस अंकुर की हरी दूब-सी,
मन में स्वयं उभरती कविता।

भोर भए ललकार तिमिर को,
सूरज की मद्धम किरणों-सी।
जैसे जगत प्रकाशित करती,
नभ से स्वयं उतरती कविता।

साँझ ढले आकाश में ऊँचे,
एक छोर से परम क्षितिज तक।
साथ परिंदों का लेकर के,
खुले गगन में उड़ती कविता।

और कभी बूंदों में ढलकर,
मेघों की गोदी से गिरकर।
बूँद-बूँद से सागर बनकर,
कागज़ तले मचलती कविता।

सच है, वो मिलने आती है,
दबे पैर और चोरी-चोरी।
अपनी ही मर्ज़ी की मालिक,
खुद मनमानी करती कविता।

- अंशुल तिवारी
  24.10.2016

2 comments: