बस समय की हूँ कथा,
या, जय-पराजय की व्यथा।
या, कि उसका आकलन,
जो था कभी, और जो न था।
या, जय-पराजय की व्यथा।
या, कि उसका आकलन,
जो था कभी, और जो न था।
मध्य प्राप्त-अप्राप्त के,
निस्त्राण-सा जो है खड़ा।
भूल कर निज की निधि,
वन-वन फिरा, वन-वन चला।
निस्त्राण-सा जो है खड़ा।
भूल कर निज की निधि,
वन-वन फिरा, वन-वन चला।
स्वांग रचकर नित नए,
मद में सदा डूबा हुआ।
स्वयं को इस भाँति से बस,
छल रहा 'मैं कौन हूँ'???
मद में सदा डूबा हुआ।
स्वयं को इस भाँति से बस,
छल रहा 'मैं कौन हूँ'???
-अंशुल तिवारी।
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