"दुनिया में धार्मिकों की कमी नहीं ग़ालिब" (व्यंगात्मक रूप से),
शायद ये मिसरा मौजूद हालात में अत्यधिक उपयोगी साबित हो सकता है।
जहाँ देखो धर्म विषयक चर्चाएँ, प्रवचन, उपदेश हैं।
किन्तु क्या धर्म यही है जो हम आप देख रहे हैं, या कदाचित है तो भी धर्म का पूर्ण स्वरुप नहीं है।
अपनी अल्पमति के अनुसार एक प्रयास, कुछ विचार अभिव्यक्त करने का.....(त्रुटियों हेतु क्षमायाचना)...
भीड़ में रह या मंचों पे चढ़ बस चिल्लाना,
धर्म नहीं है।
अपने पुरखों की थाती पर बस इतराना,
धर्म नहीं है।
बीते कल की बेड़ी पहने चलते जाना,
धर्म नहीं है।
अपनी कहना-सुनना, बस अपनी सुनवाना,
धर्म नहीं है।
बिन समझे ही स्वयं, सार जग को समझाना,
धर्म नहीं है।
भाँति भाँति के तर्कों से सबको बहलाना,
धर्म नहीं है।
निज जन की ही सुनना, और 'पर' को हड़काना,
धर्म नहीं है।
देश, काल को ताक पे रख, निर्णय कर जाना,
धर्म नहीं है।
धर्म नहीं है यह केवल कि,
एक ही पक्ष सुनाई दे।
देखो जिस भी ओर भले,
बस एक ही रंग दिखाई दे।
धर्म धीरता का प्रतीक है,
और धारण की शक्ति है।
संयम, नियम, प्राण हैं जिसके,
मानवता ही भक्ति है।
धर्म मनुज के लिए बना है,
मनुज धर्म के लिए नहीं।
भूल इसे अनगिनत बार,
क्या क्या अघ हमने किए नहीं।
मानवता को भूल गए,
हम भूले वसुधा है कुटुंब।
किन्तु धर्म ही याद रहा,
जिससे प्रगाढ़ हो गया दंभ।
धर्म वही जो मानव को,
मानव होना सिखलाए।
एक दूसरे के प्रति जो,
सौहार्द भाव उपजाए।
धर्म वही जो दे समाज को,
नर परहित अनुगामी।
हरिश्चंद्र से व्रतपालक,
शिवि, रघु, दधीचि से ग्यानी।
राम नाम ही नहीं,
राम से नर को प्रकट करे जो।
केवल बातें नहीं अपितु,
निज सुख को होम करे जो।
बने प्रेरणा, निश्छल हो जो,
कपट, खोट न जाने।
जन मंगल की इच्छा ही,
जो सबसे ऊपर माने।
ऐसा धर्म रहा तो वसुधा,
देव धाम सी होगी।
सुख, समृद्धि से भरी,
नयनाभिराम सी होगी।
अतः, समय है यह विचार,
निश्चित अपनाया जाए।
मानवता आधार हो,
ऐसा धर्म चलाया जाए।
- अंशुल तिवारी।