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Monday, 14 August 2017

मश्वरा

मेरा प्रयास, कुछ शेर।

काफ़िया- "ई"
रदीफ़- "को"

समझ मत खेल यूँ इस ज़िन्दगी को,
बहुत दुश्वार है ये आदमी को।

किसी ने चाँद तारे तोड़कर हैं घर सजाये,
कहीं दीवार और छत भी नहीं मिलते किसी को।

बहा कर ले गई गर्दिश भी अपने साथ सब कुछ,
मगर ना छीन पाई, बस मेरी "पागल" हंसी को।

शहर में थी ग़मों की आँधियाँ, और मैं अकेला,
"ख़ुदा" भी चाहता था देखना मेरी "ख़ुदी"को।

जिसे लग जाए "मर्ज़-ए-इश्क़" उसकी बात फिर क्या,
जला कर जो सुकूँ को, पी रहा हो बेख़ुदी को।

ज़माने में कई पागल से देखे हैं "दीवाने",
अमीरी छोड़कर, सर पर बिठाते "मुफ़लिसी" को।

-अंशुल तिवारी।
26.02.2016

होली छंद

होली की शुभकामनाएँ,
ब्रज की होली का एक दृश्य,

धूरि सा उड़ा गुलाल, मुख हुआ लाल लाल,
खेल-खेल रंग सारी लाज बिसराई है।

मारी पिचकारी मोरी रंग दीनी सारी देखो,
जसोदा को लाल कैसी करता ढिठाई है।

साँवरे सलोने तेरे नैनन के वार ने तो,
नख सिख संग मोरी आत्मा भिगाई है।

रंग-रसिया ने रँग दियो आज बृज सारा,
धन्य हो कन्हाई कैसो होली ये मनाई है।

-अंशुल तिवारी।

उलझन

उलझनें ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा होती हैं, ऐसा हिस्सा जो न हो तो भी मुसीबत और हो तो भी....

एक तरफ़ ज़िन्दगी का है जोखम,
एक तरफ़ शायरी का पेचो ख़म।

एक तरफ़ चोट, दर्द,आहें हैं,
एक तरफ़ ज़ख़्म के लिए मरहम।

एक तरफ़ ठेस, गर्म साँसें हैं,
एक तरफ़ बरसता सुकूँ हरदम।

एक तरफ़ सूख गया दरिया भी,
एक तरफ़ बारिशों का है मौसम।

एक तरफ़ गर्म लू के झोंके हैं,
एक तरफ़ ठंडी हवा, है मद्धम।

जाऊँ किस ओर यही सोचता हूँ,
फ़ैसला जंग से नहीं है कम।

-अंशुल।

प्रश्न

रश्मिरथी महाकाव्य में कभी श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा था,
"जाने क्यूँ क्रम ऐसा जग में विचित्र चलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी और अधिक जलता है"

देखा जाए तो यह प्रश्न अत्यंत विचारणीय है, तो प्रस्तुत है निन्मलिखित कविता...
(जो इसी प्रश्न का विस्तार है, राष्ट्रकवि दिनकर की उक्ति से प्रेरित)

दिनकर का ये प्रश्न आज मेरे दिल में पलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी ही क्यूँ अधिक जलता है।
सदियाँ बीतीं, बीते बरसों, काल चक्र चलता है,
ये विधान हो, या ये सत्य हो, पर मुझको खलता है।

प्रश्न नहीं मानव समाज से, तुझसे है विधाता,
एक तपस्वी तज कर सुख को, निज को रहा सुखाता।
शम, दम, नियम, अटल थे जिसके, कष्टों से था नाता,
परहित में संलग्न सदा जो, रहा चोट ही खाता।

पुण्य फली थे, कर्म बली थे, किन्तु न सुख था पाता।

वहीँ कहीँ पर भोगी कोई, नित नव मोद मनाए,
रक्त चाट कर दुर्बल का जो अपनी प्यास बुझाए।
भूखा मारे औरों को, अपना घर भरता जाए,
सुख साधन भी उसकी चौखट जाएँ शीष झुकाए।

परपीड़ा रत, परद्रोही, जग में सज्जन कहलाए।

झूठ कहे वह चढ़े, सत्य कहने वाला ढलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी ही क्यूँ अधिक जलता है।

- अंशुल तिवारी।

ईश्वर पर एहसान करें..

(पूजा-पाठ सम्बंधित आडम्बर के विषय में एक व्यंगात्मक विचार)

चलो सजाएँ थाल, धूप और दीपक का संधान करें,
गंध, पुष्प, नैवेद्य, साथ रख, पूरा सकल विधान करें।
जैसे-तैसे ख़ुद को कर तैयार खड़े हों मंदिर में,
घंटे और घड़ियाल बजा कर, ईश्वर पर एहसान करें।

किसी तरह रहकर भूखे, ये पर्वत सा दिन काटा है,
बिना बात के बच्चों को बस, मजबूरी में डाँटा है।
खाली पेट रहा न जाए, दुविधा कितनी भारी है,
छप्पन भोग सजाकर हमने, पूरी रखी तैयारी है।

बस, यहाँ छुपें आदित्य, वहाँ हम अपना कष्ट निदान करें,
घंटे और घड़ियाल बजाकर, ईश्वर पर एहसान करें।

देखो ये मन मेरा मुझसे, हरेक बात पर लड़ता है,
समझाता हूँ, इसे मगर ये, ढीठ ज़िद्द पर अड़ता है।
अरे समझ ले, बात मान जा, क्यूँ ऐसा हठ करता है,
जिस दिन हो उपवास हमारा, हमें नहाना पड़ता है।
किन्तु भक्ति में बंधन कैसा? मन में ये अनुमान करें।
घंटे और घड़ियाल बजाकर, ईश्वर पर एहसान करें।

जल्दी-जल्दी करो आरती, भली नहीं अब देरी है,
थोड़ा-सा ठाकुर को दे दो, फिर तो बारी मेरी है।
हुआ ख़त्म अब इंतज़ार, मैं चैन ज़रा कुछ पाऊँगा,
एक दिवस से भूखा हूँ, दो दिवस बराबर खाऊँगा।
अब मैं देख रहा अपना, तुम सबका हरि कल्याण करें,
घंटे और घड़ियाल बजाकर, ईश्वर पर एहसान करें।

हे प्रभु! तूने विविध भाँति हम सबको है सद्ज्ञान दिया,
कर्मशील बन हम स्वतन्त्र हों, ऐसा दिव्य विधान किया।
किन्तु फँसे हम छल-छंदों में, राह भटक कर घर भूले,
पाखंडों, आडम्बर से हमने तेरा अपमान किया।

अब करते हैं विनय छोड़, आडम्बर प्रेम करें तुझसे,
दर्शन कर सबमें तेरा, निज मन को आज भरें तुझसे।

-अंशुल।

छलावा

रात गए,
कुछ ख़याल आ गए,
बस बेखटके,
बिना कहे कुछ,
अनचाहे मेहमानों जैसे।

आ धमके कमरे में मेरे,
धरना देकर बैठ गए फिर।

मैं तो बस सोने वाला था,
नींद में जा खोने वाला था।
दिनभर की सब दौड़-भाग,
और उठा-पटक से बचकर, छुपकर।
थके, परेशाँ चहरे को, अंधियारे से,
धोने वाला था।

लेकिन इन कम्बख्तों ने,
पुरज़ोर कोशिशें करके,
मुझको जगा दिया।

पास आ रही निद्रा, को भी भगा दिया।

मैं भी उठा, तैश में आया,
आज क़ैद कर लूँगा इनको,
सोच के काग़ज़ क़लम उठाया।

लेकिन तब ये मैंने पाया......

ख़याल मुझे फिर चकमा देकर चले गए थे,
बेक़सूर, हम रोज़ की तरह छले गए थे।

अब कमरे में मैं था, काग़ज़ क़लम वहीं थे,
निद्राहीन नयन थे, लेकिन शब्द नहीं थे।

- अंशुल तिवारी।
11.05.2017

धर्मसार

"दुनिया में धार्मिकों की कमी नहीं ग़ालिब" (व्यंगात्मक रूप से),
शायद ये मिसरा मौजूद हालात में अत्यधिक उपयोगी साबित हो सकता है।
जहाँ देखो धर्म विषयक चर्चाएँ, प्रवचन, उपदेश हैं।
किन्तु क्या धर्म यही है जो हम आप देख रहे हैं, या कदाचित है तो भी धर्म का पूर्ण स्वरुप नहीं है।
अपनी अल्पमति के अनुसार एक प्रयास, कुछ विचार अभिव्यक्त करने का.....(त्रुटियों हेतु क्षमायाचना)...

भीड़ में रह या मंचों पे चढ़ बस चिल्लाना,
धर्म नहीं है।
अपने पुरखों की थाती पर बस इतराना,
धर्म नहीं है।
बीते कल की बेड़ी पहने चलते जाना,
धर्म नहीं है।
अपनी कहना-सुनना, बस अपनी सुनवाना,
धर्म नहीं है।

बिन समझे ही स्वयं, सार जग को समझाना,
धर्म नहीं है।
भाँति भाँति के तर्कों से सबको बहलाना,
धर्म नहीं है।
निज जन की ही सुनना, और 'पर' को हड़काना,
धर्म नहीं है।
देश, काल को ताक पे रख, निर्णय कर जाना,
धर्म नहीं है।

धर्म नहीं है यह केवल कि,
एक ही पक्ष सुनाई दे।
देखो जिस भी ओर भले,
बस एक ही रंग दिखाई दे।

धर्म धीरता का प्रतीक है,
और धारण की शक्ति है।
संयम, नियम, प्राण हैं जिसके,
मानवता ही भक्ति है।

धर्म मनुज के लिए बना है,
मनुज धर्म के लिए नहीं।
भूल इसे अनगिनत बार,
क्या क्या अघ हमने किए नहीं।

मानवता को भूल गए,
हम भूले वसुधा है कुटुंब।
किन्तु धर्म ही याद रहा,
जिससे प्रगाढ़ हो गया दंभ।

धर्म वही जो मानव को,
मानव होना सिखलाए।
एक दूसरे के प्रति जो,
सौहार्द भाव उपजाए।

धर्म वही जो दे समाज को,
नर परहित अनुगामी।
हरिश्चंद्र से व्रतपालक,
शिवि, रघु, दधीचि से ग्यानी।

राम नाम ही नहीं,
राम से नर को प्रकट करे जो।
केवल बातें नहीं अपितु,
निज सुख को होम करे जो।

बने प्रेरणा, निश्छल हो जो,
कपट, खोट न जाने।
जन मंगल की इच्छा ही,
जो सबसे ऊपर माने।

ऐसा धर्म रहा तो वसुधा,
देव धाम सी होगी।
सुख, समृद्धि से भरी,
नयनाभिराम सी होगी।

अतः, समय है यह विचार,
निश्चित अपनाया जाए।
मानवता आधार हो,
ऐसा धर्म चलाया जाए।

- अंशुल तिवारी।