(पूजा-पाठ सम्बंधित आडम्बर के विषय में एक व्यंगात्मक विचार)
चलो सजाएँ थाल, धूप और दीपक का संधान करें,
गंध, पुष्प, नैवेद्य, साथ रख, पूरा सकल विधान करें।
जैसे-तैसे ख़ुद को कर तैयार खड़े हों मंदिर में,
घंटे और घड़ियाल बजा कर, ईश्वर पर एहसान करें।
किसी तरह रहकर भूखे, ये पर्वत सा दिन काटा है,
बिना बात के बच्चों को बस, मजबूरी में डाँटा है।
खाली पेट रहा न जाए, दुविधा कितनी भारी है,
छप्पन भोग सजाकर हमने, पूरी रखी तैयारी है।
बस, यहाँ छुपें आदित्य, वहाँ हम अपना कष्ट निदान करें,
घंटे और घड़ियाल बजाकर, ईश्वर पर एहसान करें।
देखो ये मन मेरा मुझसे, हरेक बात पर लड़ता है,
समझाता हूँ, इसे मगर ये, ढीठ ज़िद्द पर अड़ता है।
अरे समझ ले, बात मान जा, क्यूँ ऐसा हठ करता है,
जिस दिन हो उपवास हमारा, हमें नहाना पड़ता है।
किन्तु भक्ति में बंधन कैसा? मन में ये अनुमान करें।
घंटे और घड़ियाल बजाकर, ईश्वर पर एहसान करें।
जल्दी-जल्दी करो आरती, भली नहीं अब देरी है,
थोड़ा-सा ठाकुर को दे दो, फिर तो बारी मेरी है।
हुआ ख़त्म अब इंतज़ार, मैं चैन ज़रा कुछ पाऊँगा,
एक दिवस से भूखा हूँ, दो दिवस बराबर खाऊँगा।
अब मैं देख रहा अपना, तुम सबका हरि कल्याण करें,
घंटे और घड़ियाल बजाकर, ईश्वर पर एहसान करें।
हे प्रभु! तूने विविध भाँति हम सबको है सद्ज्ञान दिया,
कर्मशील बन हम स्वतन्त्र हों, ऐसा दिव्य विधान किया।
किन्तु फँसे हम छल-छंदों में, राह भटक कर घर भूले,
पाखंडों, आडम्बर से हमने तेरा अपमान किया।
अब करते हैं विनय छोड़, आडम्बर प्रेम करें तुझसे,
दर्शन कर सबमें तेरा, निज मन को आज भरें तुझसे।
-अंशुल।
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