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Monday, 14 August 2017

प्रश्न

रश्मिरथी महाकाव्य में कभी श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा था,
"जाने क्यूँ क्रम ऐसा जग में विचित्र चलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी और अधिक जलता है"

देखा जाए तो यह प्रश्न अत्यंत विचारणीय है, तो प्रस्तुत है निन्मलिखित कविता...
(जो इसी प्रश्न का विस्तार है, राष्ट्रकवि दिनकर की उक्ति से प्रेरित)

दिनकर का ये प्रश्न आज मेरे दिल में पलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी ही क्यूँ अधिक जलता है।
सदियाँ बीतीं, बीते बरसों, काल चक्र चलता है,
ये विधान हो, या ये सत्य हो, पर मुझको खलता है।

प्रश्न नहीं मानव समाज से, तुझसे है विधाता,
एक तपस्वी तज कर सुख को, निज को रहा सुखाता।
शम, दम, नियम, अटल थे जिसके, कष्टों से था नाता,
परहित में संलग्न सदा जो, रहा चोट ही खाता।

पुण्य फली थे, कर्म बली थे, किन्तु न सुख था पाता।

वहीँ कहीँ पर भोगी कोई, नित नव मोद मनाए,
रक्त चाट कर दुर्बल का जो अपनी प्यास बुझाए।
भूखा मारे औरों को, अपना घर भरता जाए,
सुख साधन भी उसकी चौखट जाएँ शीष झुकाए।

परपीड़ा रत, परद्रोही, जग में सज्जन कहलाए।

झूठ कहे वह चढ़े, सत्य कहने वाला ढलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी ही क्यूँ अधिक जलता है।

- अंशुल तिवारी।

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