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Monday, 14 August 2017

मश्वरा

मेरा प्रयास, कुछ शेर।

काफ़िया- "ई"
रदीफ़- "को"

समझ मत खेल यूँ इस ज़िन्दगी को,
बहुत दुश्वार है ये आदमी को।

किसी ने चाँद तारे तोड़कर हैं घर सजाये,
कहीं दीवार और छत भी नहीं मिलते किसी को।

बहा कर ले गई गर्दिश भी अपने साथ सब कुछ,
मगर ना छीन पाई, बस मेरी "पागल" हंसी को।

शहर में थी ग़मों की आँधियाँ, और मैं अकेला,
"ख़ुदा" भी चाहता था देखना मेरी "ख़ुदी"को।

जिसे लग जाए "मर्ज़-ए-इश्क़" उसकी बात फिर क्या,
जला कर जो सुकूँ को, पी रहा हो बेख़ुदी को।

ज़माने में कई पागल से देखे हैं "दीवाने",
अमीरी छोड़कर, सर पर बिठाते "मुफ़लिसी" को।

-अंशुल तिवारी।
26.02.2016

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