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Sunday, 18 February 2018

तजुर्बा

सारे किस्से की तर्जुमानी है,
बात थी राज़, अब ज़बानी है।

मिल भी जाए तो साथ क्या देगी?
यहाँ हर शै है क्या, बेमानी है।

जिसको दिल से लगाए बैठे हो,
ये क़ुर्बत-ए-जहाँ भी फ़ानी है।

हस्ती क्या है तुम्हारी और मेरी,
जैसे कोई मौज आनी-जानी है।

करवटें हर कदम पे लेती है,
ज़िन्दगी, पेचीदा कहानी है।

प्यार, सच्चाई, वफ़ादारी की,
बात अब हो चुकी पुरानी है।

वो जो ठहरा, सो मिट गया देखो,
ज़िन्दगी दरिया की, रवानी है।

आज फिर हमें पार जाना है,
आज फिर समंदर तूफ़ानी है।

कोई भी चुन ले राह, और चल दे,
उम्र क्या सोच में बितानी है।

आज ये फ़ैसला होगा बस के,
जान लेनी है या लुटानी है।

हारना तय हो फिर भी खेलेंगे,
आज किस्मत भी आज़मानी है।

ख़्वाब ताबीर तक नहीं पहुँचे,
बस यही दिल को परेशानी है।

कोशिशें कीजिए, कुछ तो होगा,
यही सबक-ए-ज़िन्दगानी है।

-अंशुल तिवारी।

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