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Saturday, 18 February 2017

एक बेटी की बिदाई के सन्दर्भ में....

एक बेटी की बिदाई के सन्दर्भ में....

खिलौने छीनकर अपने यूँ दौड़ती है अभी,
वो है बयार-सी जैसे, कहाँ हुई है बड़ी?

आँगन को सजाती है रंगोली बनकर,
गूँजती घर में वो सारे ठिठोली बनकर।

दीयों में रहती है घर के वो रौशनी बनकर,
छिटकती है वो झरोखों से चाँदनी बनकर।

घर सर पे उठाती है वो तूफ़ान की तरह,
छाई रहती है ज़ेहन पे वो आसमाँ की तरह।

आँखों में वो बसती है यूँ अरमाँ बनकर,
दिलों में रहती हमारे वो जैसे जाँ बनकर।

जहाँ में आई वो जैसे मेरी पहचान बनकर,
कहाँ वो चल पड़ी है आज यूँ  मेहमाँ बनकर।

जो है दुआओं भरा दिल, वो लिए जा रही है,
नया जहान, नई ज़िन्दगी बुला रही है।

ख़ुशी के फूल उसकी राह में खिलते ही रहें,
कारवाँ जश्न के हर मोड़ पे मिलते ही रहें।

- अंशुल।

Tuesday, 6 December 2016

जब चुप था...

मैं चुप था,
तब तक अच्छा था।
जब बोल पड़ा,
तो बुरा हुआ।
पर मेरा इसमें दोष नहीं,
तुमने ज़िद की,
मुझसे बोले,
जो बात है दिल में,
साफ़ कहो।

मैं कह दी,
तुम सह न सके।
मुँह फुला के मुझसे रूठ गए।
अब मैं बोला,
क्यूँ रूठे हो?
तो बोले,
बड़े बुरे हो तुम।

इससे पहले ही अच्छे थे,
इतना कहकर तुम चले गए,

मैं खड़ा-खड़ा सोचता रहा,
जब चुप था तब ही बेहतर था।

-अंशुल तिवारी।

Saturday, 26 November 2016

भाषण...

भाषण, वक्तव्य विधा का सबसे सरल प्रकार है (व्यंगात्मक रूप से)।
अक्सर लोग इसे बड़ी सहजता से दे भी देते हैं।
शायद देने में यही वो पहली वस्तु होगी लोग जिसे किसी दूसरे को देने को हमेशा, एक पैर पर तैयार रहते हैं।
एक ख़याल इस बात पर,
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सुना हमने जो भाषण, कहा उनसे ठहर जाओ।
के जो समझा रहे हो तुम, वो ख़ुद करके दिखाओ।

जो है अंगार पे चलना, कदम पहले बढ़ाओ।
लटकना है जो सूली पर, तो हाथ अपना उठाओ।

ज़हर का घूँट पीना है, तो तुम प्याला उठाओ।

मियाँ हँसकर ज़रा बोले, न यूँ हमको फ़ँसाओ।
इन्हें बातें ही रहने दो, हकीकत न बनाओ।

अगर कुछ फ़ायदा चाहो, हमारे साथ आओ।
चढ़ो मंचों पे हाँको, ख़याल के घोड़े दौड़ाओ।

जो श्रोता हैं उन्हें वादों का घिस, चन्दन लगाओ।
ज़माना है सुनो मत, सुनाकर life बनाओ।

- अंशुल।

Tuesday, 22 November 2016

उलझन...

सुनता आया हूँ
हमेशा कि, काफ़ी है
समझदार को इशारा ही।
मगर मैं सोचता हूँ,
वो जो समझदार है,
उसे क्यूँ चाहिए इशारा??
क्यूँ नहीं वो समझ सकता,
हालत को देखकर,
या महसूसकर??
और यदि फिर भी चाहिए,
इशारे का सहारा,

तो नासमझ करे क्या बेचारा??

-अंशुल।

Wednesday, 9 November 2016

काश...

काश, 
बस कुछ देर और
जो नींद नहीं टूटती।
तो,
तैरता मैं सपनों की झील में,
उड़ता ख़्याल के बादल पर,
टहलता ख़्वाबों के समंदर किनारे,
कुछ देर और भीग लेता,
ख्वाहिशों की बारिश में।
मगर करूँ क्या??

रात जब भी हसरतें थपकियाँ देकर सुलाती हैं, 
ज़रूरतें झंझोड़कर जगाने चली आती हैं।


- अंशुल।

Saturday, 5 November 2016

वो...

बातें होती ही रहती हैं, होती भी रहेंगी...
बातों का क्या है,
पर ये ख़्याल समर्पित है उन्हें जो बात को समझे तो नहीं हैं पर समझाते खूब हैं।
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वो कहते रहे,
मैं सुनता रहा,
सिलसिला चलता रहा।

सुनते-सुनते फिर शाम ढली,
जब शाम ढली तो पता चला।

जो बात वो मुझसे कहते हैं,
वे ख़ुद भी नहीं समझते हैं।

फिर क्यों वे कहते रहते हैं,
न उन्हें पता, न मुझे पता।

मैं उठा,
उठे वो साथ मेरे, मैं इधर गया,
वो किधर गए?

कुछ नहीं पता, कुछ नहीं पता।

-अंशुल।

Friday, 4 November 2016

वेदना...

वेदना कहती है मुझको,
आज तो अभिव्यक्त कर दो।
शब्द का देकर सहारा,
आज मुझको मुक्त कर दो।

कह भी दो अब वह कथा,
कब जन्म था मैंने धरा।
क्यूँ मुझे धारण किए हो,
आज कह भी दो ज़रा।

क्यूँ किए मन को व्यथित,
चलते हो शूलों की डगर।
पाओगे परित्राण राही,
मुझको मन से त्याग कर।

पर मैं कहता वेदना से,
त्यागकर तुझको भला।
चैन से क्या रह सकूँगा??
त्राण क्या पाऊँ भला??

साथ तेरा लिए मैं चलता रहा, लिखता रहा,
भावनाएँ व्यक्त कर नव गीत मैं रचता रहा।
तू बनी साथी मैं जब भी दुःख से आतप्त था,
छोड़कर तुझको बता कैसे रहूँगा मैं भला??

सच है तपकर वेदना से जन्म पाता गीत है,
वेदना मन की सखी है, और ये ही मीत है।
वेदना अनिवार्य है, जीवन गति का मूल है,
वेदना का ताप सहना मनुज के अनुकूल है।

- अंशुल तिवारी