दुइ जोरि के हाथ, नाववहुँ माथ, प्रणाम करूँ जिमि दण्ड परै।
मन माँहि मनावउँ, सीस धरूँ, रज चरनन से तव जो निझरे।।
तुम दीन सखा, हम दीन को दीन, इहै हम जानत माँहिं उरै।
हमको निज दास को दास करौ, दरबार खरे हम अर्ज करें।।
सब लोक के नाथ, हो भूतपति, सबके हित के रखवार तुमै।
सब के प्रिय हो, सबके प्रियतम, सबही का धरै हौ भार तुमै।।
सबके भीतर, सबके बाहर, सबही का भए बिस्तार तुमै।
निज भक्तन के तुम प्राण प्रभो, तिनके तो सकल आधार तुमै।।
नहिं रिक्त गए, अभिषिक्त भए, तव द्वार गुहार कियो जिन ने।
जिन जोड़ लिए बन्धन तुम्ह से, भवसागर पार कियो तिन ने।।
तुम्हरी किरपा जिन्ह पाई प्रभो दुख सागर पार कियो तिन ने।
जिनके तुम बन्धु, सखा, स्वामी, निज का उद्धार कियो तिन ने।।
अति दीनदयाल, कृपालु परम्, करुणानिधि, पालक, नाथ तुमै।
तिन को नहिं काम बिचारन को, जिन के हर पग हो साथ तुमै।।
तिन्ह को सागर, कुइयाँ सम है, जिन्ह का गहि लीनो हाथ तुमै।
निज चरनन आश्रय दीन्ह कियो, भक्तन को नाथ, सनाथ तुमै।।
।।इति श्री वृन्दावनचन्द्र चरणे विनयपद निवेदन सम्पूर्ण।।
।।श्री राधिकावल्लभ प्रेरणोत्पन्न:।।
।।श्री श्री श्यामश्यामर्पणमस्तु।।
-अंशुल तिवारी