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Sunday, 24 March 2019

।।विनय चतुष्पदी।।

दुइ जोरि के हाथ, नाववहुँ माथ, प्रणाम करूँ जिमि दण्ड परै।
मन माँहि मनावउँ, सीस धरूँ, रज चरनन से तव जो निझरे।।
तुम दीन सखा, हम दीन को दीन, इहै हम जानत माँहिं उरै।
हमको निज दास को दास करौ, दरबार खरे हम अर्ज करें।।

सब लोक के नाथ, हो भूतपति, सबके हित के रखवार तुमै।
सब के प्रिय हो, सबके प्रियतम, सबही का धरै हौ भार तुमै।।
सबके भीतर, सबके बाहर, सबही का भए बिस्तार तुमै।
निज भक्तन के तुम प्राण प्रभो, तिनके तो सकल आधार तुमै।।

नहिं रिक्त गए, अभिषिक्त भए, तव द्वार गुहार कियो जिन ने।
जिन जोड़ लिए बन्धन तुम्ह से, भवसागर पार कियो तिन ने।।
तुम्हरी किरपा जिन्ह पाई प्रभो दुख सागर पार कियो तिन ने।
जिनके तुम बन्धु, सखा, स्वामी, निज का उद्धार कियो तिन ने।।

अति दीनदयाल, कृपालु परम्, करुणानिधि, पालक, नाथ तुमै।
तिन को नहिं काम बिचारन को, जिन के हर पग हो साथ तुमै।।
तिन्ह को सागर, कुइयाँ सम है, जिन्ह का गहि लीनो हाथ तुमै।
निज चरनन आश्रय दीन्ह कियो, भक्तन को नाथ, सनाथ तुमै।।

।।इति श्री वृन्दावनचन्द्र चरणे विनयपद निवेदन सम्पूर्ण।।
।।श्री राधिकावल्लभ प्रेरणोत्पन्न:।।
।।श्री श्री श्यामश्यामर्पणमस्तु।।

-अंशुल तिवारी

Friday, 22 March 2019

कबीरा सरारारा

रंगोत्सव की पिचकारियाँ..

जली होलिका, उड़ा अबीरा,
सुन भई साधो, कहत कबीरा!
घाम बढ़ी ,अब काटो खीरा,
मुँह पे नमक लगाए,
जो कड़ुआ बोलें, तिनको भी,
दीजो इहै उपाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!

खेलो अपना पर्व मनाओ,
भर पिचकारी रंग उड़ाओ!
तनिक न तुम इसमें सकुचाओ,
जो कोई बाँटे ज्ञान,
गाल लाल उनके कर दीजो,
देसी चपत लगाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!

बोले हर्बल रंग लगाओ,
200 रुपए किलो मंगवाओ!
बात ठीक पर, ज़रा बताओ,
जो घर में बनवाएं,
65 रुपए किलो बन जावे,
भर भर हाथ उड़ाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!

रंग चले, पाछे फिर हाला,
भैंस बराबर अक्षर काला!
समझें, बैठे पहने माला!
कवि उत्तम कहलाएँ,
गीत लिखें टूटे-फूटे सब,
हमें रहे समझाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!

कविता रोई, छंद गुहारे,
शेर गए कितने ही मारे!
पर शायर हिम्मत ना हारे,
कविता को लजवाए,
काग़ज़ काला किये हुए हैं,
बैठे कलम उठाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!

-अंशुल तिवारी।

Tuesday, 19 March 2019

होली!! 2019

कौन कहता है?.
ज़रूरत है मुझे...
भीड़ की, या किसी हुजूम की ही!
टोलियाँ अब जो मेरे पास नहीं,
न हों वे!
लोग अब जो सभी अनजान हैं,
अनजान रहें!
कौन कहता है?
बिन समूह रंग उड़ते नहीं!!
कौन कहता है?
बिन हुजूम रंग खिलते नहीं!!
मैंने अपने घर में,
आज बनाए हैं रंग,
अपनी मेहनत के साथ,
लिए तुम्हारा ही संग!
कल है होली,
इनको ख़ूब मैं लुटाऊँगा,
रंग जितने हैं, भरे हाथ से,
उड़ाऊँगा,
लाल, पीले, हरे, नीले,
सभी मिलाकर मैं,
कल के दिन,
ख़ूब तयारी से मैं,
ख़ुद अकेला ही,
एक दुनिया को रँग आऊँगा!!

-अंशुल।

Monday, 18 March 2019

बुज़ुर्ग!!

मैंने देखा उनको,
लोग कुछ अजब से हैं!
ज़िन्दगी के सुनहरे रंग लिए,
चाँदनी सर पे ओढ़ रक्खी है!
वक़्त को हाथ में पकड़कर यों,
साथ में उम्र के टहलते हैं।
ज़िन्दगी धूप में गुज़ारी पर,
छाँव जैसे वो मगर लगते हैं।
वो जिन्हें गीत पुराने सारे,
मुँह-ज़बानी हैं याद कितने ही!
आज भी जब कभी अकेले हों,
गुनगुनाते हैं धुन सुनाते ही!
वो जो हर काम सही करते हैं,
वो जो अब नाम भूल जाते हैं।
मैंने देखा उनको.....

वो जो खेतों में थे, जवान हुए।
आज़माने नसीब शहरों में,
गाँव की छाँव छोड़ आए थे।
वो जिनके थे उसूल ऐसे ज्यों,
पत्थरों पे लकीर आई हो।
उलझनें ज़िन्दगी की हों या फिर,
जोड़ने या की गुणाभाग की हो,
चंद लम्हों में वो सुलझाते हैं।
जब कभी पूछना चाहूँ कुछ तो,
कोई किस्सा मुझे सुनाते हैं।
उम्र भर राह में चलते-चलते,
अपनी झोली में तजुर्बे कितने,
कीमती पत्थरों-से रक्खे हैं।
जिनको दो हाथ से लुटाते हैं!
मैंने देखा उनको...

जिनको अब याद नहीं ज़्यादा कुछ,
भूलते पर नहीं बहुत कुछ जो!
वक़्त बीता वो याद करते हैं,
अपनी अच्छी-बुरी कहानी को,
बारहा शौक से दोहराते हैं।
सीख देते हैं, कभी डाँटते हैं,
प्यार बेमोल कभी, बाँटते हैं।
मैं परेशान जो हो जाता हूँ,
ज़िन्दगी से मैं जो घबराता हूँ!
बैठते साथ मेरे कुर्सी पर,
ज़िन्दगी फिर मुझे समझाते हैं!
मैंने देखा उनको...

शौक उनके नहीं बाकी अब कुछ,
सिर्फ़ अपनों का साथ काफ़ी है!
जिनकी आँखों ने वक़्त को देखा,
रंग औ' रूप बदलते देखा,
देख रक्खी है ज़िन्दगी सारी,
अब न जिनको कोई ख़ुमारी है,
लड़खड़ाते हैं मगर,
कदम हैं मज़बूत बड़े,
जिनको अपनी न ख़बर हो शायद,
पर वो बाहोश हुए जीते हैं!
घर की पक्की दीवार जैसे वो,
छत टिकाए हुए अपने ऊपर,
बन के जैसे दुआएँ रहते हैं।
घर में होने से जिनके,
महक बनी रहती है,
जैसे लोभान, धूप और,
हवन की ख़ुशबू।
धीरे-धीरे टहलते हुए,
धीमे कदमों से,
दर-ओ-घर सबको ही महकाते हैं।
मैंने देखा उनको....

-अंशुल तिवारी
(पौत्र: श्री रामप्रकाश तिवारी)

Monday, 11 March 2019

उपदेश!!

उपदेश!!
इस समय की माँग है,
तुम अब गला दो....,
भेंट कर दो अग्नि को,
अपने सभी आभूषणों को,
और पिघला कर बनाओ,
शस्त्र तीखे,
हाथ की चूड़ी गला दो!
चक्र तुम उसका बना लो,
और अंगूठी बना कर,
धार उसमें तुम सजा दो।
तुम गले के हार,
पिघला कर बनाओ खड्ग अपना।
करधनी, पिघलाओ उसको,
रूप दो यमपाश का ही!
पाँव की पाज़ेब, को,
ख़ंजर बनालो।
झोंक झुमके और झूमर,
हवन कर के नाक नथनी,
पैर के बिछुए मिलाकर।
तुम बनाओ एक बरछा,
उड़ रहे अपने धवल,
आँचल को थामो!
ध्वज बनाओ।
साथ ही अपमान की,
अवहेलना की आग पीकर।
नयन का अमृत सुखाओ।
और ये संकल्प कर लो!
अब न बाँटोगी,
कभी, जीवन किसी को,
चीर छाती या उदर को।
अब न दोगी जन्म,
यों कर नष्ट ख़ुदको।
मारकर ख़ुद को,
नहीं इस सृष्टि की रचना करोगी।
प्रण करो,
अब छोड़ दोगी रूप,
ममता से भरा ये!
और धारण अब करोगी
दशभुजाएँ!
रूप गौरी का छिपाकर,
फिर धरोगी रूप काला।
फिर करोगी रक्त से अभिषेक अपना।

-अंशुल तिवारी।

Tuesday, 5 March 2019

सागर!!

उछलता है, मचलता है,
गरज कर, सर उठाता है,
बिफ़रता है, बिखरता है,
सब्र जब छूट जाता है,
तो ढलकर बूँद बनता है, ,
लरज़ता, टूट जाता है।
मगर फिर भी सहेजे ख़ुद,
क़दम रोके हुए अपने,
तट की दहलीज़ का,
बिन कहे पालन करता है,
सागर नहीं तोड़ता, अपनी मर्यादा कभी!

घोर करता विलाप,
रोज़ ही न जाने क्यूँ,
चीखता है, ये गरजता है,
न जाने किस पर,
तटों के बन्ध में जकड़ा हुआ,
महासागर!
पत्थरों पर पटकता हाथ,
सर पटकता है।
लगाए शक्ति समूची, जो भरी भीतर है,
तटों को तोड़ बह निकलने को,
तड़पता है।
मगर न सोच के क्या,
हाथ खींच लेता है,
अपने हर ज़ोर को मुट्ठी में,
भींच लेता है।
लौट आता है, वो दहलीज़ में,
हमेशा ही,
और सागर नहीं तोड़ता,
अपनी मर्यादा कभी!!

वो जानता, उसे कौन रोक सकता है?
जो बहना चाहे उसे, कौन टोक सकता है?
मगर वो जानता है ये,
अगरचे बह निकला,
न जाने कितने घोंसले भी टूट जाएँगे,
आशियाने बने हैं, जो वो बिखर जाएँगे,
कितने कितने ही लोग, जड़ से उखड़ जाएँगे।
इसलिए, रोक अपने आँसूओं को पी-पीकर,
जितनी बेताबियाँ हैं, जज़्ब उन्हें ख़ुद में कर,
वो निगल जाता है, ग़म के दरिया ही सभी,
पर,
सागर नहीं तोड़ता, अपनी मर्यादा कभी!!

-अंशुल।

यार!!

यार कैसा होता है?
यार होता है,
परछाईं-सा!
दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब जैसा!
कदम के निशान की तरह!
वो रहता है हरदम साथ,
बिन कहे, बिन बताए,
जैसे पैरों के नीचे की ज़मीन हो।
वो आधार बनकर भी,
ख़ामोश ही रहता है,
शोर नहीं मचाता।
यार होता है,
पर्स में पड़े छुपे हुए,
बचत के रुपयों जैसा,
वक़्त पड़ने पर काम आता है।
और फिर छुप जाता है,
उसी जगह।
यार होता है,
शराब जैसा,
पुराना हो तो नशा,
और भी बढ़ जाता है जिसका।
ज़ख़्म बाहर के हों, या भीतर के!
दुआ और दवा दोनों ही बन जाता है!
यार लाजवाब होता है,
और ज़रूरी भी!
जैसे जिस्म को साँस।

-अंशुल।

Sunday, 3 March 2019

अस्तित्व

मैं मिट्टी की पैदावार हूँ!
पड़ा था अंश मैं बनके धरा का,
मिला आकार मुझे कुम्हार से,
तपाया काल की भट्टी ने मुझको,
दृढ़ तभी हो सका शायद,
अन्यथा बह गया होता,
समय की जलधार से!!

जो नहीं होता यहाँ पर,
और मैं होता कहीँ तो!
रूप लेकर मैं नया ख़ुद,
खोजता ख़ुद को कहीँ तो!

तब कहानी और होती,
तब रवानी और होती,
भाग्य ये होता अलग,
ये ज़िंदगानी और होती।

कुछ पलों के फेर ने, ये कर दिखाया,
यूँ दिया आकार, यूँ मुझको बनाया।

याद है सबकुछ, कहूँगा,
फिर कभी विस्तार से!!....(समय की जलधार से)....

मैं हुआ जो भी,
हुआ मुझसे यहाँ जो भी!
महज़ संयोग है,
ये योजना मेरी नहीं है!!

है किसी की प्रेरणा,
ये है किसी की योजना,
मुझको चलाता राह जो,
अंजान-सी है।

कोई है जो फ़ैसले लेता है मेरे,
कोई है जो राह में है फूल रखता,
या कभी कंटक उठाकर फेंकता है।

जानता हूँ मैं नहीं हूँ बस अकेला,
खेलता है साथ मेरे, कोई तो उस पार से!!

अतः, मैं ही बस नहीं हूँ, एक कारण,
है नहीं एकाकी ये अस्तित्व मेरा।

कोई मेरे साथ हरदम जी रहा है,
साँस लेता साथ मेरे ही रहा है।

मैं नहीं हूँ जानता वह कौन है जो,
चल रहा है साथ फिर भी मौन है जो।

क्या पता, यूँ छुप रहा, वह कौन है??
रू-ब-रू जो है, सदा मेरी कथा के सार से!!

सत्य बस मेरा यही है,
मैं धरा का एक हिस्सा।
लिख चुका विधिकार जिसका,
अनगिनत में एक किस्सा।

उस कथा पर चल रहा,
मैं पार उसको कर रहा हूँ।
जेब में अनुभव, भले या,
अनभले सब भर रहा हूँ।

जो मिला मुझको, कथा में,
था मेरी लिक्खा हुआ वो।
क्या किया मैंने अभी तक,
जो कि ख़ुद सोचा हुआ हो??

ये महज़ संयोग है,
जो मैं बना हूँ!

हो गया था तय बहुत पहले ही जैसे,
कुछ किया मैंने नहीं तो क्या कहूँ अधिकार से!!

-अंशुल तिवारी।