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Tuesday, 5 March 2019

सागर!!

उछलता है, मचलता है,
गरज कर, सर उठाता है,
बिफ़रता है, बिखरता है,
सब्र जब छूट जाता है,
तो ढलकर बूँद बनता है, ,
लरज़ता, टूट जाता है।
मगर फिर भी सहेजे ख़ुद,
क़दम रोके हुए अपने,
तट की दहलीज़ का,
बिन कहे पालन करता है,
सागर नहीं तोड़ता, अपनी मर्यादा कभी!

घोर करता विलाप,
रोज़ ही न जाने क्यूँ,
चीखता है, ये गरजता है,
न जाने किस पर,
तटों के बन्ध में जकड़ा हुआ,
महासागर!
पत्थरों पर पटकता हाथ,
सर पटकता है।
लगाए शक्ति समूची, जो भरी भीतर है,
तटों को तोड़ बह निकलने को,
तड़पता है।
मगर न सोच के क्या,
हाथ खींच लेता है,
अपने हर ज़ोर को मुट्ठी में,
भींच लेता है।
लौट आता है, वो दहलीज़ में,
हमेशा ही,
और सागर नहीं तोड़ता,
अपनी मर्यादा कभी!!

वो जानता, उसे कौन रोक सकता है?
जो बहना चाहे उसे, कौन टोक सकता है?
मगर वो जानता है ये,
अगरचे बह निकला,
न जाने कितने घोंसले भी टूट जाएँगे,
आशियाने बने हैं, जो वो बिखर जाएँगे,
कितने कितने ही लोग, जड़ से उखड़ जाएँगे।
इसलिए, रोक अपने आँसूओं को पी-पीकर,
जितनी बेताबियाँ हैं, जज़्ब उन्हें ख़ुद में कर,
वो निगल जाता है, ग़म के दरिया ही सभी,
पर,
सागर नहीं तोड़ता, अपनी मर्यादा कभी!!

-अंशुल।

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