रंगोत्सव की पिचकारियाँ..
जली होलिका, उड़ा अबीरा,
सुन भई साधो, कहत कबीरा!
घाम बढ़ी ,अब काटो खीरा,
मुँह पे नमक लगाए,
जो कड़ुआ बोलें, तिनको भी,
दीजो इहै उपाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!
खेलो अपना पर्व मनाओ,
भर पिचकारी रंग उड़ाओ!
तनिक न तुम इसमें सकुचाओ,
जो कोई बाँटे ज्ञान,
गाल लाल उनके कर दीजो,
देसी चपत लगाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!
बोले हर्बल रंग लगाओ,
200 रुपए किलो मंगवाओ!
बात ठीक पर, ज़रा बताओ,
जो घर में बनवाएं,
65 रुपए किलो बन जावे,
भर भर हाथ उड़ाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!
रंग चले, पाछे फिर हाला,
भैंस बराबर अक्षर काला!
समझें, बैठे पहने माला!
कवि उत्तम कहलाएँ,
गीत लिखें टूटे-फूटे सब,
हमें रहे समझाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!
कविता रोई, छंद गुहारे,
शेर गए कितने ही मारे!
पर शायर हिम्मत ना हारे,
कविता को लजवाए,
काग़ज़ काला किये हुए हैं,
बैठे कलम उठाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!
-अंशुल तिवारी।
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