मैंने देखा उनको,
लोग कुछ अजब से हैं!
ज़िन्दगी के सुनहरे रंग लिए,
चाँदनी सर पे ओढ़ रक्खी है!
वक़्त को हाथ में पकड़कर यों,
साथ में उम्र के टहलते हैं।
ज़िन्दगी धूप में गुज़ारी पर,
छाँव जैसे वो मगर लगते हैं।
वो जिन्हें गीत पुराने सारे,
मुँह-ज़बानी हैं याद कितने ही!
आज भी जब कभी अकेले हों,
गुनगुनाते हैं धुन सुनाते ही!
वो जो हर काम सही करते हैं,
वो जो अब नाम भूल जाते हैं।
मैंने देखा उनको.....
वो जो खेतों में थे, जवान हुए।
आज़माने नसीब शहरों में,
गाँव की छाँव छोड़ आए थे।
वो जिनके थे उसूल ऐसे ज्यों,
पत्थरों पे लकीर आई हो।
उलझनें ज़िन्दगी की हों या फिर,
जोड़ने या की गुणाभाग की हो,
चंद लम्हों में वो सुलझाते हैं।
जब कभी पूछना चाहूँ कुछ तो,
कोई किस्सा मुझे सुनाते हैं।
उम्र भर राह में चलते-चलते,
अपनी झोली में तजुर्बे कितने,
कीमती पत्थरों-से रक्खे हैं।
जिनको दो हाथ से लुटाते हैं!
मैंने देखा उनको...
जिनको अब याद नहीं ज़्यादा कुछ,
भूलते पर नहीं बहुत कुछ जो!
वक़्त बीता वो याद करते हैं,
अपनी अच्छी-बुरी कहानी को,
बारहा शौक से दोहराते हैं।
सीख देते हैं, कभी डाँटते हैं,
प्यार बेमोल कभी, बाँटते हैं।
मैं परेशान जो हो जाता हूँ,
ज़िन्दगी से मैं जो घबराता हूँ!
बैठते साथ मेरे कुर्सी पर,
ज़िन्दगी फिर मुझे समझाते हैं!
मैंने देखा उनको...
शौक उनके नहीं बाकी अब कुछ,
सिर्फ़ अपनों का साथ काफ़ी है!
जिनकी आँखों ने वक़्त को देखा,
रंग औ' रूप बदलते देखा,
देख रक्खी है ज़िन्दगी सारी,
अब न जिनको कोई ख़ुमारी है,
लड़खड़ाते हैं मगर,
कदम हैं मज़बूत बड़े,
जिनको अपनी न ख़बर हो शायद,
पर वो बाहोश हुए जीते हैं!
घर की पक्की दीवार जैसे वो,
छत टिकाए हुए अपने ऊपर,
बन के जैसे दुआएँ रहते हैं।
घर में होने से जिनके,
महक बनी रहती है,
जैसे लोभान, धूप और,
हवन की ख़ुशबू।
धीरे-धीरे टहलते हुए,
धीमे कदमों से,
दर-ओ-घर सबको ही महकाते हैं।
मैंने देखा उनको....
-अंशुल तिवारी
(पौत्र: श्री रामप्रकाश तिवारी)
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