यार कैसा होता है?
यार होता है,
परछाईं-सा!
दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब जैसा!
कदम के निशान की तरह!
वो रहता है हरदम साथ,
बिन कहे, बिन बताए,
जैसे पैरों के नीचे की ज़मीन हो।
वो आधार बनकर भी,
ख़ामोश ही रहता है,
शोर नहीं मचाता।
यार होता है,
पर्स में पड़े छुपे हुए,
बचत के रुपयों जैसा,
वक़्त पड़ने पर काम आता है।
और फिर छुप जाता है,
उसी जगह।
यार होता है,
शराब जैसा,
पुराना हो तो नशा,
और भी बढ़ जाता है जिसका।
ज़ख़्म बाहर के हों, या भीतर के!
दुआ और दवा दोनों ही बन जाता है!
यार लाजवाब होता है,
और ज़रूरी भी!
जैसे जिस्म को साँस।
-अंशुल।
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