उपदेश!!
इस समय की माँग है,
तुम अब गला दो....,
भेंट कर दो अग्नि को,
अपने सभी आभूषणों को,
और पिघला कर बनाओ,
शस्त्र तीखे,
हाथ की चूड़ी गला दो!
चक्र तुम उसका बना लो,
और अंगूठी बना कर,
धार उसमें तुम सजा दो।
तुम गले के हार,
पिघला कर बनाओ खड्ग अपना।
करधनी, पिघलाओ उसको,
रूप दो यमपाश का ही!
पाँव की पाज़ेब, को,
ख़ंजर बनालो।
झोंक झुमके और झूमर,
हवन कर के नाक नथनी,
पैर के बिछुए मिलाकर।
तुम बनाओ एक बरछा,
उड़ रहे अपने धवल,
आँचल को थामो!
ध्वज बनाओ।
साथ ही अपमान की,
अवहेलना की आग पीकर।
नयन का अमृत सुखाओ।
और ये संकल्प कर लो!
अब न बाँटोगी,
कभी, जीवन किसी को,
चीर छाती या उदर को।
अब न दोगी जन्म,
यों कर नष्ट ख़ुदको।
मारकर ख़ुद को,
नहीं इस सृष्टि की रचना करोगी।
प्रण करो,
अब छोड़ दोगी रूप,
ममता से भरा ये!
और धारण अब करोगी
दशभुजाएँ!
रूप गौरी का छिपाकर,
फिर धरोगी रूप काला।
फिर करोगी रक्त से अभिषेक अपना।
-अंशुल तिवारी।
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