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Sunday, 17 June 2018

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

महाप्राण, राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर जी की पुण्यतिथि (24.04.1974)
पर उन्हें भावांजलि और उनका पुण्य स्मरण।

दिनकर तुमको शत बार नमन....

हे! शब्दब्रह्म के नित साधक,
मानव के हित के आराधक।

हे! गिरातनय, हे! वाणीसुत,
दैवीय तेज के हे! वाहक।

ख़ुद समय बोलता था लेकर,
तव शब्दावलि का अवलंबन।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

हे महातपस्वी!, तेजपुंज,
साहित्य कला के हे निकुंज!

मानव समाज जब हीन बना,
तुम उभरे बनकर शक्तिपुंज।

नर का सुषुप्त अभिमान जगा,
था दैन्य भाव का किया दमन।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

वीरत्व, प्रखर स्वर परम घोर,
निःसीम ज्ञान, बिन ओर छोर।

अद्भुत प्रतापमय, वाणी ज्यों,
ले स्वयं महासागर हिलोर।

जन गण,को समझाया तुमने,
है तुच्छ हीनता का जीवन।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

राधेय कभी बनकर बोले,
बन कृष्ण ज्ञान के पट खोले।

कुरुकुल के कभी पितामह बन,
कर्तव्य भेद तुमने खोले।

अगणित रचनाओं से हमको,
फिर करवाया इनका दर्शन।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

संघर्षशील जीवन जीकर,
विष सदा विषमता का पीकर।

शिवरूप बने तुम नीलकण्ठ,
जन-जन का क्षत मानस सीकर।

इस परम गरल को अनल बना,
दुष्टों के हित फिर किया वमन।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

तुम अटल, अचल हो महासूर्य,
मृत मानव के जयघोष तूर्य।

कविता नभ के हे विवस्वान!
देदीप्यमान! हे तेजवान!!

हे मित्र ! निराले जन-जन के,
हे शुभचिंतक! इस जन-गण के।

हे राष्ट्रभक्त!  हे ज्ञाननिधि!
अविजित योधा जीवन रण के।

हे शब्दपुरुष! हे अजर अमर!
साहित्य धरा के परम शिखर।

तम युक्त जगत को दे प्रकाश,
टूटे मन में उपजाई आस।

इस अतुल अलौकिक भेंट हेतु,
स्वीकार करो ये अभिनंदन।

हममें इतना सामर्थ्य कहाँ??
कुछ सोच लिखें या कह पाएँ!

केवल मन से छू सकते हैं,
तव शुभ्र, अलौकिक , दिव्य चरण।

दिनकर तुमको शत बार नमन!!

- अंशुल।

Sunday, 27 May 2018

श्री हनुमतवंदनाष्टक

।।हनुमंत वंदना।। (अष्टक)
1.
केसरी किसोर, जाके बल को न ठौर कोई,
ऐसो रखवार तज और कहाँ जाईए।।
अशरण शरण औ' करुणा निधान राम,
दास के चरण में ही मन को लगाईए।।
लोक को सँवार, परलोक भी बनाए देत,
साहिब सुजान हनुमान को मनाईए।।
नीति-रीति, विधि के विधान में न उलझिये,
छल-बल त्याग बस राम राम गाइये।।

2.
जाको सुमिरन दुःख दुसह दरिद्र हरै,
नाम लेत संकट सकल मरि जात हैं।।
जिनकी हुँकार से, त्रिलोक होत कंपित व,
नीच असुरों के दुष्ट दल भय खात हैं।।
राम का आसीस जाके सीस नित सोहत है,
सम्भव, असम्भव को क्षण में बनात हैं।।
साधुजन रच्छक हैं, दुष्ट गण भच्छक हैं,
राम को गुलाम, "महावीर जी" कहात हैं।।

3.
खेल-खेल माँहिं छाती, गगन की चीर कर,
हाहाकार अंतरिक्ष, जाय के मचाए हैं।।
भूख लगने पे दिनकर को समझ फल,
जगत प्रकाशक को मुख में छिपाए हैं।।
वेद जाको जयगान, गावत हैं नेति-नेति,
देव नत-शीष जाकी शरण में आए हैं।।
अंजनी के लाल जाकी, महिमा बिसाल अति,
भक्त हितकारी सब, जग में कहाए हैं।।

4.
तेज अनुपम गुण, जिनके अलौकिक हैं,
शारद व शेष पार जिनका न पाए हैं।।
हार गए ढूँढ-ढूँढ, थक गए लिख-लिख,
जेते ज्ञानवान इस, जग में कहाए हैं।।
चौदह भुवन, नभ, धरती, पताल सब,
देख-देख, छान-छान, हाय पछताए हैं।।
बुधि-बल, ज्ञान में समान, हनुमान जी के,
दूसरा न कोई यह, दृग देख पाए हैं।।

5.
एकही छलांग में जी लांघि महासागर को,
शत-योजनों को गऊ-पद सा बनाए हैं।।
जिनका प्रचंड वेग और अतिबल देख,
जल, थल, नभचर सब घबराए हैं।।
रामकाज साधने में, देर न लगाए राम-,
-बाण सम वेग धारि, हनुमत धाए हैं।।
जेते वेगवान सब, जानत जहान आज,
काल, मन, पवन, सकल ही लजाए हैं।।

6.
रामजी को दूत बन, मसक सों रूप धर,
रामजी की जय बोल कपि जी सिधारे हैं।।
द्वार पे ही लंक के जो, लंकिनी ने रोक लिया,
मुठिका प्रबल हनुमान, तब मारे हैं।।
सीय सुधि ज्ञात कर, अवसर साधकर,
मारि-मारि, फेंक-फेंक, असुर संघारे हैं।।
तिनको के ढेर सम, स्वर्ण पुर फूँक दियो,
कूद-कूद इत-उत, लंका सब जारे हैं।।

7.
ऐसो अतुलित बल, आपने दिखायो फिर,
लौट रघुनाथ जी के, चरणों में आए हैं।।
बीर बिकरम ज्ञान, गुण में प्रथम आप,
रामजी को दास कहलात सुख पाए हैं।।
परम् विनीत गुणवान हनुमान जैसा,
योधा तिहुँ लोक में न, और कोई पाए हैं।।
युद्ध में प्रबुद्ध, सन्त परम् विशुद्ध, हिय,
प्रेम की अनोखी गंगधार को समाए हैं।।

8.
आशुतोष शंकर को, अंश हनुमान राम,
काज साधने के हित लीन्ह अवतार हो।।
अंजनी के लाल महाकाल दुष्टजन हेतु,
निज जन हेतु प्रेम सागर अपार हो।।
दास कहे जोरि पाणि, संकट सहाय होवो,
नाव फँसी नाथ मेरी, बीच मझधार हो।।
और का भरोस मोहे कछु नहिं नाथ मेरे,
रखवार आप बस, अंजनीकुमार हो।।

।।श्री हनुमतवंदनाष्टक सम्पूर्ण।।
।।श्री रामार्पणमस्तु।।
।।जै जै सिया राम, जै जै हनुमान।।

-अंशुल।।

Thursday, 3 May 2018

लम्हे!!

समय से चुराकर,
समय से बचाकर।
उठा लो ये लम्हे,
छुपा लो ये लम्हे,
ये लम्हे वही हैं,
जो जुड़कर बनेंगे,
हमारी कहानी के किस्से सुहाने।
इन्हें चुन के रखलो,
ये हैं फूल जिनसे,
महकते रहेंगे सभी दिन पुराने।
यही याद के हैं वो,
बेमोल मोती,
पिरोकर जिन्हें हम सजाएँगे जीवन।
इन्हीं के सहारे बिताएँगे जीवन!!
ये लम्हे नहीं सिर्फ़,
कतरा समय का!!
ये लम्हे तो हैं ज़िन्दगी की निशानी,
इन्हीं से बनी है, इन्हीं से बनेगी,
ज़रा और बेहतर-सी ये ज़िंदगानी।
तुम्हारी-मेरी दास्ताँ,
जो भी होगी,
यही रंग बनकर निखर जाएँगे फिर।
अगर खो गए,
तो बिखर जाएँगे फिर।
उठा लो ये लम्हे,
चुरा लो ये लम्हे।
नहीं पर  ये आसाँ,
ज़रा है ये मुश्क़िल,
जो हो साथ तेरा,
तो मिल जाए मंज़िल!!

-अंशुल।।

Monday, 2 April 2018

क्यूँ ज़रूरी होता है?

सन्दर्भ:
कभी कभी सत्य को भुला देने में ही व्यवहारिकता होती है।
पर क्या ये उचित है?? ये कहाँ तक उचित है??
क्या इसी तर्ज पर सत्य को भूल अन्याय सहना उचित है?
इसी प्रश्न को उठाती हुई ये कविता...

क्यूँ ज़रूरी होता है?
अक्सर,

रगों में खौलते- उबलते सत्य को,
रोक लेना, आँखों में ही।
पीस कर रख देना,
दांतों के बीच।

या, फिर छुपा लेना,
किसी पुराने ज़ख़्म की तरह।
चेहरे की निर्जीव, मृत मुस्कराहट के पीछे।

क्यूँ ज़रूरी होता है?
अक्सर,
ह्रदय में उभरते, कौंधते सत्य को
दफ़न कर देना धड़कनों के शोर में।

घोंट देना गला उसका, अपनी ही मुट्ठियों से?
या, रख देना पैरों तले कुचलकर।

क्यूँ ज़रूरी होता है?
अक्सर,

सत्य को अंगारे सा हाँथों में दबाए रखना,
या, सहन करना त्वचा में धँसी फाँस की तरह क्षण-क्षण।

क्यूँ ज़रूरी होता है?
सामने खड़े, सत्य से नज़रें चुराना,
कतराना, भाग जाना।

क्यूँ ज़रूरी होता है??

-अंशुल।

Wednesday, 28 March 2018

तेरी याद आई...

एक अज़ीज़ दोस्त, हम मिजाज़, हम ख़्याल, हम-प्याला, हम-निवाला यार के नाम.....(ये लफ्ज़ कुछ भी नहीं है तेरे आगे)

जब कभी दिल मेरा घबराया तेरी याद आई,
आज जब जाम उठाया तो, तेरी याद आई।

जब कभी सोग में डूबा मैं आँख भर सी गई,
मुझे तह-ए-दिल से यार, तेरी याद आई।

पास हैं लोग बहुत से मगर न जाने क्यों,
बारहा दिल को मेरे सिर्फ तेरी याद आई।

जब कभी भी हुआ घायल मैं चोट खाकर के,
बनके मरहम ज़हन में, यार तेरी याद आई।

यार के दिल को सिर्फ़ यार से ही राहत है,
दिल जो दुनिया ने जलाया तो, तेरी याद आई।

वक़्त बे वक़्त ठहाके, हँसी वो पागल सी,
वक़्त वो याद जो आया, तो तेरी याद आई।

साँस दर साँस मेरे दिल में तू भी आता है,
साँस के साथ मेरे यार तेरी याद आई।

एक हिस्सा मेरे वजूद का तुझमें गुम है,
क्या कहूँ यार बहुत मुझको तेरी याद आई।

तू भले कुछ भी कहे यार ये तेरा हक है,
सच मैं कहता हूँ बहुत यार तेरी याद आई।

Sunday, 25 March 2018

तस्वीर खिंचवाओ प्यारे।

आज के समय में प्रसिद्ध होना अत्यंत आवश्यक है, चाहे जिस प्रकार हो किन्तु होना अनिवार्य है।
प्रस्तुत है निम्नलिखित विधि, मौजूदा हालात में प्रसिद्धि पाने की।
विश्वास कीजिए कितना सरल है।
(व्यंगात्मक रचना)

करो तुम काम यों कितने ही न्यारे,
मगर तस्वीर भी खिंचवाओ प्यारे।

न केवल खींच अपने पास रक्खो,
वरन्, अख़बार में छपवाओ प्यारे।

नहीं माँगें जो संपादक महोदय,
स्वयं जाकर उन्हें दे आओ प्यारे।

अरे पढ़-लिख के तुम मत वक़्त काटो,
किसी ऊँचे क्लब में जाओ प्यारे।

नज़र आयोजकों पर रखो पैनी,
जहाँ हों, तुम लपककर जाओ प्यारे।

करो बातें यहाँ की, और वहाँ की,
बस उनकी हाँ में हाँ, मिलाओ प्यारे।

यूँ ही बिन बात के, फल-फूल लेकर,
कभी अध्यक्ष के घर जाओ प्यारे।

करो तारीफ़ इतनी, जैसे बस वे,
स्वयं भगवान हैं, बतलाओ प्यारे।

वो आमंत्रित करें या न करें पर,
स्वयं तुम गोष्ठियों में जाओ प्यारे।

प्रभावी लोग जो कुछ भी सुनाएँ,
तुरत जयगान उनका गाओ प्यारे।

प्रशंसा के बड़े पुल उनके बाँधो,
पड़ो चरणों में, बलि बलि जाओ प्यारे।

वहाँ से पर न खाली हाथ लौटो,
ज़रा तस्वीर भी खिंचवाओ प्यारे।

कराओ फ़्रेम, फिर सबको दिखाओ,
जगत से तुम, प्रसिद्धि पाओ प्यारे।

- अंशुल तिवारी
(अप्रैल, 2017/ पुणे)

Wednesday, 21 March 2018

वो जो ठहरा...

वो जो ठहरा, सो मिट गया देखो,
ज़िन्दगी दरिया की, रवानी है।

आज फिर हमें पार जाना है,
आज फिर समंदर तूफ़ानी है।

कोई भी चुन ले राह, और चल दे,
उम्र क्या सोच में बितानी है।

आज ये फ़ैसला होगा बस के,
जान लेनी है या लुटानी है।

हारना तय हो फिर भी खेलेंगे,
आज किस्मत भी आज़मानी है।

ख़्वाब ताबीर तक नहीं पहुँचे,
बस यही दिल को परेशानी है।

कोशिशें कीजिए, कुछ तो होगा,
यही सबक-ए-ज़िन्दगानी है।

-अंशुल।