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Thursday, 13 October 2016

तुम्हारी तरह

मुझे तुम सी ही लगती हैं,
ये बारिश की बेबाक बूँदें।
पारदर्शी शीशे की तरह,
शीतल, तृप्तिदायक।
जो भिगो देती हैं मुझे, तुम्हारी तरह।

हाँ, मुझे तुम सी ही लगती है,
ये सुबह की भीनी भीनी रौशनी,
बादलों की हथेलियों से छिटक रही ये धूप।
जैसे सहलाती है मेरे चेहरे को, तुम्हारी तरह।

हाँ, मुझे तुम सी ही लगती है,
साँझ की ये ठंडी बयार,
जो घूमती है मेरे इर्दगिर्द, और 
तेज़ी से कुछ कह जाती है मुझसे,
तुम्हारी तरह।

हाँ, मुझे तुम सी ही लगती है,
ये रात की खामोशी।
मानो वह चुपचाप मेरे काँधे पर सर रखकर सो गई हो,
तुम्हारी तरह।

-अंशुल तिवारी 

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