hamarivani badge

a href="http://www.hamarivani.com/update_my_blogg.php?blgid=4653" target="_blank">www.hamarivani.com

Tuesday, 25 October 2016

आज नहीं पाता हूँ मैं....

बदलते वक़्त के साथ सबकुछ बदल जाता है. 'नया' जन्म पाता है, 'पुराना' भुला दिया जाता है/ मिटा दिया जाता है.
किन्तु, अगर कुछ नहीं मिटता तो वो हैं 'यादें' बीते कल की...यादें बचपन की...यादें उम्र के उस सुहाने मौसम की...
पर शायद बदलाव के  तेज़ ज्वार में वो अनमोल यादें, निशानियाँ, कहानियाँ, खो गई हैं।
अब बहुत कुछ है लेकिन फिर भी एक खालीपन है. एक कोशिश उन्हीं यादों के तालाब में गोता लगाने की...और  कुछ देर ज़िन्दगी की कड़ी धूप से बचकर ठंडक पाने की.....
*********************************************************************************

आज नहीं पाता हूँ मैं घर में अपने।
टूटी-फूटी कुछ चीज़ों का एक वो गट्ठर,
जिसे सहेजा था बचपन में,
किसी ख़ज़ाने से बढ़कर।

टुकड़े कुछ रंगीन काँच के,
कुछ इमली की घिसी गुठलियाँ।
कुछ भटके शतरंज के मोहरे,
रेत से चुनकर रखी सीपियाँ।
ज़ंग लगी पिस्तौल,
जो शायद किसी दिवाली पाई थी,
टूटी लकड़ी की तलवारें जो मेले से लाईं थी
आज नहीं पाता हूँ मैं घर में अपने।

अलमारी के ऊपर बैठा वो डिब्बा,
जिसके खुलते ही आमों का मौसम,
फिर ताज़ा हो जाता था।
और अमावट मुँह में घुलकर,
बाग़ीचे के मीठे किस्से याद दिलाता था।
आज नहीं पाता हूँ मैं घर में अपने।

आँगन को ढँकता अपनी ठंडी छाया से,
दिनभर धूप के ताप में जलता,
था दरख़्त एक बरगद का।
घर के किसी बुज़ुर्ग की भाँति,
जिसकी गोदी में चढ़कर,
मैं दुनिया से छिप जाता था।
आज नहीं पाता हूँ मैं घर में अपने।

- अंशुल तिवारी

2 comments:

  1. बाबू,

    अच्छा लिखा है..... बात कह जाती है बहुत कुछ अपने साथ...

    यूँ ही लिखते रहो...

    ReplyDelete
  2. बाबू,

    अच्छा लिखा है..... बात कह जाती है बहुत कुछ अपने साथ...

    यूँ ही लिखते रहो...

    ReplyDelete