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Sunday, 23 October 2016

कभी-कभी...

कभी-कभी अच्छा लगता है,
बिन बोले कुछ, तुमको दिल की बात सुनाना।
या फिर यूँ ही तुम्हें देखना, देखे जाना।

कभी-कभी अच्छा लगता है,
बेसरपैर की बातें करना , तुम्हें हँसाना।
और तुम्हारी मृदुल हँसी का लुत्फ़ उठाना।

कभी-कभी अच्छा लगता है,
किसी खेल में बेईमानी से तुम्हें जिताना।
और जीत का जश्न मनाना, तुम्हें रिझाना।

कभी-कभी अच्छा लगता है,
छोटी-छोटी बातों पर भी तुम्हें सताना।
और रूठ जाने पर, मेरा तुम्हें मनाना।

कभी-कभी अच्छा लगता है,
कलम उठाकर, अल्फ़ाज़ों से तुम्हें सजाना
तुमपर अपने लफ्ज़ लुटाना, लिखते जाना 

-अंशुल तिवारी


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