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Sunday, 18 February 2018

तजुर्बा

सारे किस्से की तर्जुमानी है,
बात थी राज़, अब ज़बानी है।

मिल भी जाए तो साथ क्या देगी?
यहाँ हर शै है क्या, बेमानी है।

जिसको दिल से लगाए बैठे हो,
ये क़ुर्बत-ए-जहाँ भी फ़ानी है।

हस्ती क्या है तुम्हारी और मेरी,
जैसे कोई मौज आनी-जानी है।

करवटें हर कदम पे लेती है,
ज़िन्दगी, पेचीदा कहानी है।

प्यार, सच्चाई, वफ़ादारी की,
बात अब हो चुकी पुरानी है।

वो जो ठहरा, सो मिट गया देखो,
ज़िन्दगी दरिया की, रवानी है।

आज फिर हमें पार जाना है,
आज फिर समंदर तूफ़ानी है।

कोई भी चुन ले राह, और चल दे,
उम्र क्या सोच में बितानी है।

आज ये फ़ैसला होगा बस के,
जान लेनी है या लुटानी है।

हारना तय हो फिर भी खेलेंगे,
आज किस्मत भी आज़मानी है।

ख़्वाब ताबीर तक नहीं पहुँचे,
बस यही दिल को परेशानी है।

कोशिशें कीजिए, कुछ तो होगा,
यही सबक-ए-ज़िन्दगानी है।

-अंशुल तिवारी।

Wednesday, 14 February 2018

आदमी

आदमी...

जब से संरचना हुई है संसार की।
बात तब से ही है विचार की।

के, प्रकृति ने बराबरी से किया सबका पोषण,
सहेज संवारा हर रचना को , दिया समान ही तोषण।

फिर ये देखकर हैरानी हुई, के कोई वहीँ पर रुक नहीं।
उसे प्रकृति ने जहाँ छोड़ा वहीँ पर झुका नहीं।

तो , समय को भी पछाड़कर,
दुर्गमता को। ललकार कर।

रखता चला गया काल के माथे पर चरण,
आदमी आगे निकल गया।

थे दो ही हथियार उसके,
अस्तित्व की इस जंग में।
नियंता की इस भेंट का उपयोग कर।
भलीभांति, सूझ बूझ से प्रयोग कर।

बुद्धि और भुजाओ का जोर लगाकर।
जो आया पथ में सामने उसे हटाकर।
्करता चला गया  निरंतर विजय का वरण।
आदमी बढ़ता चला गया।

विजय यात्रा उसकी यहीं पर रुकी नहीं।
महत्त्वाकांक्षा मूल्यों के आगे भी झुकी नहीं।
तो,
लगाकर आग मर्यादाओं में।
वो सेंकता चला गया स्वार्थ गूंथी रोटियाँ।
और,
गुज़रते वक़्त ने बढाया न केवल,
गति को, प्रगति को।
अपितु बदल के रख दिया पुरी मनःस्थिति को।

उसकी भूख कुछ यों बढ़ी,
ग्राह्य जो भी मिला सब निगल गयी।

और अब,
संवेदनाओ को जलाकर।
निज चेतना को भुलाकर।
मूल्यों को, मर्यादाओं को आग लगाकर।

आदमी जीता है, बस आदमी को "खा कर"।ं

बुझती रात! उगते तारे...

बुझती रात के उगते तारे!!

एक बार पूछा मैंने,
ओ! बुझती रात के उगते तारे।

क्यूँ तू उगा गहन तिमिर में?
आखिर क्या मंशा है तेरी?

छोटा सा है जीवन तेरा,
और, ये लंबी रात घनेरी।

हुआ जन्म तेरा जिसमें, वो
प्रहर बीतने वाला है।

चंद पलों में रवि प्रकाश।
तुझको खा जाने वाला है।

ओ! बुझती रात के उगते तारे।

उदित हुआ तू किस इच्छा से,
कौन कामना लेकर मन में।

दुर्दम रण करने आया है,
अपने छोटे से जीवन में।

मुझे निरर्थक ही लगता है,
प्रकट वृथा परिकल्प ये तेरा।

तुझे लीलने , है प्रकाश इक ओर,
तो दूजी ओर अँधेरा।

ऐ! बुझती रात के उगते तारे।

पथ को रोके घनी घटा ये,
सबल खड़ी है, ये मत भूल।

सघन ओट इसकी ढँक लेगी,
तुझको प्यारे, ये मत भूल।

अतः, भ्रमित हो रह जाएगा।
जीवन यूँ ही कट जाएगा!
सोच अंत में क्या पाएगा??

ऐ! बुझती रात के उगते तारे।

सुन कर मेरी बात ठिठोली सी,
हंस पड़ा अचानक वो।

फिर बोला वो मुझसे, हे मानव।

जो भी कहा सत्य है तूने।
पर समझा क्या ये भी तूने।

मेरा ये लघु जीवन ही,
आदर्श है सदा महापुरुषों का।

मेरे नभ में आते ही कई योगी जन उठ जाते हैं।
फिर, अपने कर्म की अग्नि जला, जो आप रवि बन जाते हैं।

दर्शन कर के मेरा ही रवि की उर्जा निखरती है।
उसके ही पश्चात धरा पर नूतन किरण बिखरती हैं।

मैं ही दूत भोर का भी हूँ, मैं ही तम का नाशक हूँ।
रात को प्रातः करने वाले, संदेसे का वाहक हूँ।

मैं ही हूँ वो क्रान्ति ज्योति,जो
अंधियारे से टकराती है।

चोट निशा के अहं पे कर,
उजियारे में छुप जाती है।

मेरे जीवन का अंत कदापि,
व्यर्थ न किसी विधि जाता है।
ये मेरा बलिदान ही है जो,
दिनमणि को ले आता है।

जब तक जीता सभी के मन को।
आनंद से भर जाता हूँ।
अपने क्षणिक जीवन के होते,
भी बस मुस्कुराता हूँ।

बस इसको ही मान स्वयं पर मैं,
विधाता का वरदान।
पूर्ण शान्ति से, गर्व से भर कर,
करता हूँ मैं चिर विश्राम।

बातें सुन उसकी सारी,
मैं बोल ही पड़ा अचानक के।

धन्य तेरा जीवन है प्यारे,
सत्य ही तेरा कथन है प्यारे।

ऐ, बुझती रात के उगते तारे।

-अंशुल।

नव वर्ष गीत

नव वर्ष।

पतझड़ के झड़े पात,
बीती बोझिल सी रात।
कोकिल के कंठ से फिर,
फूटा नव युगल राग।

आयो मंगल प्रभात,
नवल तेज, कांति लिए।
बरस रहा है प्रकाश,
अद्भुत सी शांति लिए।

छिटक पड़ी ज्यों नभ की,
रौशनी भरी गागर।
धूप की निकली धारा,
फैल गया उजियारा।

जागे हैं नींद से फिर,
उद्यम, बल, शील, ज्ञान।
करने निर्माण नवल,
एक जुट हुए प्राण।

आनंद भरपूर हुआ,
गूंज है गीत नया।
आया है वर्ष नया,
मन छायो हर्ष नया।

भूलें जो बीत गया,
तज दें जो रीत गया।

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें।

-अंशुल।

वह जवानी क्या???

वह जवानी क्या??

वह जवानी क्या? के जो ना कर रही निर्माण हो।
वह जवानी क्या? के जो ना चढ़ रही परवान हो।
जो डिगा ना दे, गिरि को अपनी बस हुंकार से।
वह जवानी क्या? के जो ना कर रही उत्थान हो।

जो न बेड़ी डाल दे अविजित रिपु के पाँव में।
चीर धरती जो निकाले सुख, दुःखों की छाँव में।
जो न दहला दे अरिदल को महज़ ललकार से।
वह जवानी क्या? के जो ना शौर्य का परिमाण हो।

जो उठाये हाथ ना ढोने किसी के भार को।
जो न कर पाए प्रकाशित तेज से संसार को।
जो न आए सामने, निर्भीक हो प्रतिकार से।
वह जवानी क्या? के जिसका ध्येय ना परित्राण हो।

-अंशुल।

परित्राण- कष्ट से मुक्ति दिलाना।
परिमाण- मात्र, या नाप।
प्रतिकार- विरोध।
अरिदल- शत्रु का समूह।
अविजित रिपु- अजेय शत्रु।
ध्येय- लक्ष्य।

अवध की होली

होली पर रंग भरी अयोध्या की झाँकी।

हनुमत धावें रंग भक्ति के लगाए और,
लखन ने आज रंग सेवा के लगाए हैं।।

भरत ने त्याग रंगा, शत्रुघन शौर्य रंगे,
कपिराज आज मीत रंग रंगे आए हैं।।

सुत प्रेम रंग रँगी माता श्री कौसल्या आज,
पिता दसरत्थ रंग गर्व के लगाए हैं।।

निज जन हेतु प्रीत पावन के रंग रँगे,
जानकी रमण आज फूले न समाए हैं।।

अवध निवासी जन आनंद मगन सब,
रंग सुख-स्नेह के गगन भर छाए हैं।।

ऐसो मनहर देख देख दृश्य हतप्रभ,
देव, देवलोक तज, अवध में आए हैं।।

इंद्र संग देवदल, नृत्य में मगन सब,
जान के ये बात, ब्रम्हदेव हर्षाए हैं।।

कालहुँ के काल महाकाल, प्रेम रंग मय,
झूम झूम रूप नटराज का बनाए हैं।।

उम्मीद सजाए रखना!!

अपनी उम्मीद सजाए रखना।
यूँ न इस दिल को बुझाए रखना।
रास्ते ख़त्म भी हो जाएंगे,
जोश क़दमों का बनाए रखना।

जहाँ बदल गया बाज़ारों में,
ज़मीर अपना बचाए रखना।

वो आज खुश है मेरे आने से,
खुदा! भरम ये बनाए रखना।

ज़माना देखकर कुरेदेगा,
दिलों के ज़ख्म छुपाए रखना

ठोकरें ही जो दिल को दें उनसे,
भला क्या दिल को लगाए रखना।

लौट कर आऊँगा , वादे को मेरे,
घर की चौखट पे चरागों सा जलाए रखना।

-अंशुल।

मंज़िल और मैं

मंजिल और मैं...

बस चला ही जा रहा हूँ,
किसी सफर पर,
मैं खेलता लुका छुपी।

लक्ष्य मेरे अब, छलावे लग रहे हैं,

जैसे मृग को रेत में भी पानी दिखता है।
या,
क्षितिज की कोई कल्पना,
जहाँ मिलेगा व्योम धरा से।

नभ के ऊपर किसी स्वर्ग की एक कथा में,
खुद को भी मैं शायद देख रहा होता हूँ।

पग पग से दूरी के सागर को फिर भरता,
हूँ मैं चलता रहता अविरल पथ पर अपने।

पर ये दूरी फिर भी कायम क्यूँ रहती है,
लुका छुपी भी बस यूँ ही चलती रहती है।

शहर...अब नहीं रहा वैसा!!

"शहर अब नहीं रहा वैसा"

न तो ज़मीं बदली,
न आसमाँ का रंग।

समा सारा लेकिन बदल सा गया है।
अब नहीं दौड़ता कोई यहां तितलियों के पीछे,

किवाड़ सभी बंद हैं, और खिड़कियाँ सटी हुई।
अब सीखते हैं, बच्चे भी बाँटना "तेरे और मेरे" हिस्सों को।

शहर अब नहीं रहा वैसा।

अब भीड़ भी नहीं होती है त्योहारों में।
न तो गाड़ियों का जाम लगता है बाज़ारों में।

धूल बस अपने साथ लिए तन्हाई, नापती है गालियाँ।
दिल सभी सोए से हैं, लोग भी खोए से हैं।
अब दुनिया भी सिमटने लगी है, शायद "चारदीवारी" में।

शहर अब नहीं रहा वैसा।

अब ख़त्म हो गयी है वो मिठास,
जो गुझिया से ज़ुबाँ तक जाती थी।
ज़ुबाँ से दिल और दिलों से घरों में फ़ैल जाती थी।

"दाम कुछ इस क़दर भी नहीं बढे हैं शक्कर के अभी",
पर शायद अब चूल्हे तंग से हो गए हैं।

शहर अब नहीं रहा वैसा।

-अंशुल।

Saturday, 3 February 2018

श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 02

अध्याय ०२

करुणा समेटे हृदय में, नयनों में अश्रु भरे हुए,
अतिदीन हो कुंतीतनय ने, ये वचन हरि से कहे।

सुनकर वचन ये वीर के, निज सखा से हरि ने कहा,
हे शूरवीर शिरोमणि! तुझको अचानक क्या हुआ??
किस मोह से पीड़ित हुआ, तू हो गया अति दीन है,
ये आचरण तेरे लिए, अति त्याज्य है, अति हीन है।

तू दीनता को त्याग दे, न कीर्तिपथ अवरुद्ध कर,
कुछ ध्यान कर सद्धर्म का, तू वीरता से युद्ध कर।
ये है नपुंसकता सखे, तुझको न शोभा दे रही,
अपना प्रबल साहस जगा, है रास्ता तेरा यही।

अर्जुन पुनः कहने लगा, हे कृष्ण! ये बतलाईए,
क्या राज लिप्सा के लिए यह कृत्य करना चाहिए?
इक भूमि के टुकड़े को पाने के लिए, केशव कहो,
गुरु, तात का वध मैं करूँ, क्या है उचित बोलो प्रभो?

इससे बहुत अच्छा है, जा कर तप करूँगा मैं कहीं,
मैं भीख लेकर खाऊंगा, कुल का करूँगा वध नहीं।**
इस तरह सबको मारकर , केशव भला क्या पाऊँगा??
जो भी मिले रण जीत कर, पर हाथ खाली जाऊँगा।

अतएव क्यों मैं तुच्छ निज हित के लिए पापी बनूँ??,
क्यों मैं सकल संसार में, निजवंश का घाती बनूँ??
हे कृष्ण! मैं अति दुःख से होकर ग्रसित, करता विनय,
निज शिष्य मुझको जानिए, ले शरण में कीजै अभय।

संजय उवाच-
राजन्!!कहे जब पार्थ ने भगवान से ऐसे वचन,
हँसते हुए कहने लगे उससे, पुनः मोहन मदन।

श्रीभगवानुवाच-
हे वीर! कैसी तू अनोखी बात करता है भला,
सुनकर जिसे उत्पन्न होता है मुझे अचरज बड़ा।
तू पंडितों-सी बात करता है सखा मेरे, मगर,
फिर मन दुखाता है स्वयं का, शोक में यूँ डूबकर।

ये लोग जिनको तू सगा अपना समझता है यहाँ,
ये सोचकर मुझको बता गत जन्म में ये थे कहाँ?
क्या तू इन्हें पहचानता भी था, तुझे क्या है पता??
इस जन्म के उपरांत, जाएँगे कहाँ मुझको बता??

ये ध्यान रख ये सब यहाँ जो हैं तुझे दिखते खड़े,
अनगिनत जन्मों से इसी संसार में उलझे पड़े।
तू भी नहीं नूतन, पुरातन जीव है तू भी सखा,
इस तत्व को ले जान, यूँ मत शोक इनका कर वृथा।

जिनको यहाँ तू देखकर, है मोह बंधन में पड़ा,
तू जानता क्या है उन्हें सत रूप में मुझको बता?
इस देह के भीतर छुपा है, भेद क्या? सुन भी ज़रा,
हाँ समझ जिसको नष्ट होगा, शोक ये सारा तेरा।

यह देह तो है यन्त्र केवल, एक जैसे म्यान है,
इसमें जो रहता जीव है, उसका न तुझको ज्ञान है।
वह तत्व जो निर्जर, अमर है, जीव-आत्मा है सखा,
शाश्वत, अलौकिक है, अजर है, जो यहाँ रहती सदा।

हाँ, दुःख-सुख का भान केवल देह को होता सदा,
पर यह अनश्वर जीव-आत्मा ,एक-सी रहती सदा।
यह जन्मती-मरती नहीं, ये न बदलती रूप है,
इस भेद तू कर गृहण, ये ज्ञान दिव्य अनूप है।

जो मर नहीं सकती कभी, क्या कोई उसका वध करे?
फिर क्यों सघन संताप लेकर, व्यर्थ तू मन में डरे??
जैसे मनुज तजकर पुराने वस्त्र, लेता है नए,
वैसे ही जीवात्मा बदलती है, पुरानी देह ये।

फिर नए वस्त्रों की तरह, यह देह नव धारण करे,
इस तथ्य को तू जान क्यों संदेह बिन कारण करे?
ना शस्त्र इसको छेदता, ना कष्ट देता है अनल,
न जल डुबोता है इसे, न सुखा सकता है अनिल।

यह तो अछेद्य, अदाह्य है, अशोष्य है, अक्लेद्य है,
मेरी समझ से भेद यह अति गूढ़ है,दुर्भेद्य है।
अव्यक्त है, ये अचिन्त्य है, है यह विकारों से परे,
जो नष्ट होता है नहीं, तू शोक उसका क्यूँ करे??

यदि जीव-आत्मा के विषय में तू नहीं कुछ जानता,
तब भी तेरा यह शोक है अनुचित, यही हूँ मानता।
यह हैं तेरे परिवारजन, पर इसी जीवन में सखा,
पिछले या अगले जन्म में, ये थे कहाँ मुझको बता??

जिसका हुआ है जन्म उसका अंत भी निश्चित समझ,
जो मर चुका, फिर जन्म लेगा, सोच में तू मत उलझ।
तू तो अलौकिक वीर है, क्यूँ हो रहा भयभीत है??
ये रास्ता तेरा नहीं, न क्षात्रकुल की रीत है!!

हर तरह से यह युद्ध तेरे धर्म के अनुकूल है,
तू त्याग करता है इसे, कितनी बड़ी यह भूल है।
यदि इस समय होकर दुखी तू छोड़ देगा रण सखा,
संसार तुझको स्मरण रख, कायर पुकारेगा सदा।

अपमान से क्या और भीषण वीर का है दुख बता?
क्यों शत्रुओं को दे रहा तू, ये अलौकिक सुख बता?
तू हो सबल धनु थाम ले, चिंता से तू क्या पाएगा?
यदि युद्ध में मर भी गया तो धाम मेरे आएगा।

सुख-दुःख को सम जानकर, रण के लिए तैयार हो,
जिससे धरा संतुष्ट हो, इसका तनिक उद्धार हो।
जो कुछ कहा मैने अभी वह ज्ञान का विस्तार है,
सुन, अब तुझे समझा रहा, क्या कर्म का आकार है।

इस गूढ़ कर्मरहस्य को, कुछ लोग ही हैं जानते,
अन्यान्य जन तो भोग को ही हैं यहाँ पहचानते।
जो स्वर्ग और अपवर्ग की लिप्सा में ही उलझे रहें,
वे कर्म के सिद्धांत की अनुशीलना कैसे करें??

जो सार है इस योग का, उसको समझना है तुझे,
अन्यत्र अवरोधों का रखकर ध्यान, बचना है तुझे।
बस है तेरा अधिकार केवल कर्म पर यह जान ले,
फल क्या मिलेगा कर्म से, इस पर तनिक मत ध्यान दे।

आसक्ति का कर त्याग, तू संबुद्ध होकर कर्म कर,
सब ओर से मन को हटा, निर्वाह अपना धर्म कर।
जो है हुआ अब तक नहीं, उसपे तेरा क्या ज़ोर है,
विधि की अलग ही चाल है, जिसका न कोई ठौर है।

तू है धनंजय, रणकुशल, है लक्ष्य भेदन में अटल,
धर धीर, मन को साध ले, कर्तव्य पथ पर हो अचल।
सुख-दुःख, लाभालाभ में, जय-पराजय में, एक हो,
मत शोक, चिन्ता, दुःख में, अपना विलक्ष विवेक खो।

अब समझ ले इस भेद को, जो तुझे बतलाता हूँ मैं,
संसार में ही मुक्ति का यह, मार्ग दिखलाता हूँ मैं।
जो कर्मफल आसक्त है, रुचिहीन निज उद्धार में,
वह तो सदा रहता फँसा, इस व्यूह-से संसार में।

जो आस में फल की हुआ हो, कर्म वो निःसार है,
यह काम योगी का नहीं, ये तो जगत व्यापार है।
जो कर्म के उपरांत करता, कर्मफल की मांग है,
छलता स्वयं को ही, स्वयं के साथ करता स्वांग है।

हाँ है उचित यह,कर्म का फल प्राप्त होना चाहिए,
पर मन न कर्ता का तनिक यूँ, आप्त होना चाहिए।
जो लालसा में है सना वह कर्म तो फलता नहीं,
ज्यों अश्व कोई काठ का ,पग एक भी चलता नहीं।

फल ही जिसे बस चाहिए, वह तो बड़ा दुर्बुद्ध है,
हर कर्म उसका हीन है, है निंदनीय, अशुद्ध है।
वह कर्मबन्धन में फँसा फिर मुक्त होता है नहीं,
पथभ्रष्ट होता, ज्ञान से फिर युक्त होता है नहीं।

जो इंद्रियों का दास बनकर कर्म करता है यहाँ,
वह मुक्ति की इस राह पर फिर पाँव धरता है कहाँ??
हे मित्र मेरे! हे परंतप! मोह तज, स्थितप्रज्ञ हो,
जिससे बने हर कर्म पावन, दिव्य जैसे यज्ञ हो।

है वीर वह, क्षत्रिय वही, मन से न माने हार जो,
संकट पड़े जो सामने, उसको करे स्वीकार जो।
तू वीरकुल भूषण है मेरे सखा, इसका ध्यान धर,
जो आ पड़े स्वीकार ले बस ईश आज्ञा मानकर।

तू वीर है! तू श्रेष्ठ है! ये अतः तेरा धर्म है,
संसार का उद्धार हो जिससे वही शुभकर्म है।
निःशंक होकर तू वरण कर इस सुअवसर का सखा,
संसार को दे त्राण का वरदान ,निज साहस जगा।

जो स्वार्थपरता से विलग होकर, निबाहे धर्म को,
वह सिद्ध योगी ही, समझ पाता जगत के मर्म को।
मत चेतना से हीन बन, निजलाभ केवल साधकर,
नर जन्म पाकर दिव्य तू, मत घोर ये अपराध कर।

मन अश्व की वल्गा पकड़, कर वश इसे हे वीरवर!
भटके यदि सद्धर्म से, ला सुपथ पर फिर खींचकर।
पशुबुद्धि का है काम बस, निजलाभ केवल साधना,
तू है प्रबुद्ध सखा ज़रा, कर सिद्ध परहित कामना।

इस कीच से जब बुद्धि तेरी मुक्ति को पा जाएगी,
यह ज्ञान की गंगा ह्रदय तेरा विमल कर जाएगी।
स्थिर बुद्धि जब धारण करेगा, मुक्ति तू भी पाएगा,
फिर लौट कर संसार के भवबन्ध में ना आएगा।
अर्जुन उवाच-

केशव बताओ थिर मति, क्या आचरण करता भला?
क्या बोलता, क्या सोचता, लक्षण कहो उसके ज़रा।
कहते किसे स्थिप्रज्ञ हैं, मुझको तनिक बतलाइए,
यह तत्व क्या है, कर कृपा मुझको तनिक समझाइए।

सुनकर विनय पृथुपुत्र की, फिर कृष्ण यों कहने लगे,
ज्यों द्रवित हो निर्झर किसी, गिरिगुहा से बहने लगे।
हे मित्र! जो निज कामना कर भस्म, करता यज्ञ है,
संसार में निष्काम कहलाता, वही स्थितप्रज्ञ है।

उद्विग्न जो दुख में नहीं ,सुख में न खोता धीर है,
निज राग, भय, को जीतता, जग में कहाता वीर है।
लेकिन बड़ी उस वीर से भी एक ऐसी शक्ति है,
करती पराजित जो उसे, उसकी छुपी आसक्ति है।

आसक्ति के आधीन होकर, बुद्धि नर खोता सदा,
पर मोल इसका अंततः होता चुकाना है बड़ा।
भ्रम में फंसा आसक्त नर, स्वाधीन रहता है नहीं,
वह दास होकर दुःख फिर क्या-क्या कहो सहता नहीं।

अतएव नर को चाहिए, वह इंद्रियों पर वश करे,
अधीन कर के इंद्रियों को, प्राप्त जग में  यश करे।
अन्यथा माया में उलझकर बुद्धि तो फिर जाएगी,
सद्धर्म से तुझको हटाकर, कुपथ पर ले जाएगी।

श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 01।

श्रीमद्भगवद्गीता: काव्यानुवाद।

वंदना-
हे विघ्ननाशन! गणपति, तुमको नमन प्रारम्भ में,
पश्चात इसके कर रहा, निज कार्य को आरम्भ मैं।
हे शारदे! सादर नमन मेरा तुम्हें स्वीकार हो,
माँ, ज्ञान, बुद्धि, तेज की तुम ही यहाँ आधार हो।

करुणानिधान सुजान, हे श्रीराम! जय-जय आपकी,
मुझको चरण में दो शरण, कर भस्म जड़ संताप की।
हे विश्वमोहन! शेषशायी, जगत के पालक हरि,
मुझ दीन हेतु नेह की, कीजै प्रवाहित सुरसरि।

भूमिका-
भारत अलौकिक भूमि है, अनुपम है इसकी हर कथा,
जो ज्ञान, गुण, विज्ञान से, भरपूर रहती सर्वथा।
जीवन प्रबंधन के लिए, जो भी ज़रूरी तत्व है,
सब इन कथाओं में निहित है, सार-संग्रह, सत्व है।

हम आज ऐसी ही कथा का, कर रहे उल्लेख हैं,
जिसके सभी संदर्भ चर्चा में, विशिष्ट, विशेष हैं।
है कथा बीते काल की, पर नित नई नूतन लगे,
इसमें वचन श्रीकृष्ण के, हैं ज्ञान, मुक्ति में पगे।

ये भाग है उस ग्रंथ का, जिसको रचा मुनि व्यास ने,
पर जन्म इसको है दिया, कुन्तीतनय की प्यास ने।
हाँ बात हम करते हैं, भारत के महाभारत की ही,
जिसमें जड़ी है, दमकती, अति दिव्य 'गीता'-सी मणि।

श्री व्यास ने इसमें लिखी है मनुज की संभावना,
और साथ ही 'गीता' में लिख दी, मुक्ति की प्रस्तावना।
मानव समाज हुआ कृतार्थ, महर्षि के इस कृत्य से,
सब आवरण हर कर, मिलाया जिसने सबको सत्य से।

मुख्य लेख-
है विदित जन को, जब सुयोधन का अहम सर पर चढ़ा,
निज बंधु का अधिकार करने को हनन आगे बढ़ा।
तब कृष्ण ने चेतावनी दे, यह सुनिश्चित कर दिया,
पांडव न होंगे नत, लड़ेंगे धर्म रचने को नया।

इस के अनंतर युद्ध भीषण, दो दलों में ठन गया,
करने विशिख वृष्टि प्रबल, धनु बाँकुरों का तन गया।
लो आ खड़े हो गए सन्मुख, युद्धथल में स्नेहीजन,
हाँ देखकर जिसको धरा क्या, हिल गया किञ्चित गगन।

दोनों ही ओर समर्थ वीरों का लगा भंडार था,
सेना समूह प्रबल, विशिष्ट, समग्र पारावार था।
पलकें बिछाए था खड़ा विध्वंस कुरु के क्षेत्र में,
जैसे महापावक भरा हो, रुद्र के त्रिनेत्र में।
(धृतराष्ट्र-संजय संवाद)
इस परिस्थिति के जनक, भी बैठे थे अपने कक्ष में,
ले साथ संजय सारथी, रण देखने प्रत्यक्ष में।
धृतराष्ट्र तब बोले वचन निज सूत से विस्मय भरे,
मुझको बताओ युद्ध में,कुरु-पाण्डु सुत क्या कर रहे?

संजय ने मुनिवर व्यास से, ये पा रखा वरदान था,
वह महारण को देखने में, हो गया सज्ञान था।
निज नाथ के सुनकर वचन संजय लगा कहने तभी,
हे भरत कुलभूषण! खड़े हैं सज्ज सब योद्धा अभी।

युवराज गुरुवर द्रोण से आ कर वचन हैं कह रहे,
आचार्य किञ्चित पाण्डुपुत्रों की चमू को देखिए।
है द्रुपदसुत सेनापति, संग विकट योद्धा अन्य हैं,
सात्यकि, कुन्तिभोज, भीम, अर्जुन सभी मूर्धन्य हैं।

मैं देखता हूँ कुछ नए तारे उदित हैं हो गए,
सौभद्र के संग द्रौपदीसुत भी रणोन्मुख हो गए।
हे विप्रवर! ये देखिए इस ओर भी क्या ताप है!
हैं भीष्म सेना के पति, धनु संग तत्पर आप हैं।

आचार्य कृप विजयी, विकर्ण, के संग है तव सुत बली,
भूरिश्रवा हैं, साथ है मम मित्र कर्ण महाबली।
हैं वीर अन्या-अन्य जो मेरे लिए जीवन तजें,
हैं रणकुशल ये सब, उचित है शत्रु ईश्वर को भजें।

जिस सैन्य की रक्षा स्वयं गंगातनय हों कर रहे,
है मनुज की तो बात क्या? ख़ुद देव भी उससे डरें।
अतएव, आप विशिष्ट वीरों का समूह बनाईये,
और शीघ्र कुरुसेनापति सेवार्थ ही पहुंचाइए।

तब वीरवर श्री भीष्म ने, कर सिंह की सी गर्जना,
कर शंखध्वनि अति घोर, दे दी शत्रुदल को वर्जना।
पश्चात इसके अनगिनत रण वाद्य मिलकर बज गए,
सुन घोर स्वर उत्पन्न पाण्डव भी तुरत ही सज गए।

सबसे प्रथम श्वेताशव रथ पर, यदुपति ने यह किया,
वातावरण निज शंख के अति घोर स्वर सेे भर दिया।
पा प्रेरणा इसके अनंतर भीम, अर्जुन उठ गए,
धर्माधिपति संग अनुज सब, रणघोषणा में जुट गए।

जब एक संग ही देवदत्तोपौंड्र का स्वर छा गया, (देवदत्त-अर्जुन का शंख, पौण्ड्र- भीम का शंख)
ऐसा लगा जैसे निमंत्रण काल था तब पा गया।
हर एक योद्धा शंख लेकर घोर ध्वनि था कर रहा,
ज्यों मृत्यु को ललकार, हुँकार ही था भर रहा।

(श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद)
तब अचानक कुंतीतनय यह कृष्ण से कहने लगा,
हे देव! रणथल मध्य में स्यंदन तनिक कीजै खड़ा।

दुर्बुद्ध दुर्योधन के हित चिंतक यहाँ जो आए हैं,
संग्रामस्थल पर श्याम घन की भाँति ये जो छाए हैं।
में देखना हूँ चाहता आए यहाँ पर कौन हैं,
देकर अधम का साथ भी जो ,शस्त्रसज्जित मौन हैं।

श्री कृष्ण भी क्षण एक में, रथ वेग से लेकर चले,
थे जहाँ सज्जितशस्त्र लेकर भीष्म और गुरुवर खड़े।
बोले वचन तब पार्थ से, लो देख लो जो चाहिए,
तेरे हृदय में अब कोई संशय न रहना चाहिए।

अर्जुन ने जब कर लक्ष्य देखा ,कौरवों की सैन्य को,
अत्यंय मर्माहत हुआ, उपलब्ध होकर दैन्य को।
तब ग्रसित होकर शोक से, वह रुदन था करने लगा,
संकल्प जर्जर हो गया, अर्जुन ठगा-सा रह गया।

साहस समेटा पार्थ ने, और वचन भगवन से कहे,
(विधि का कुरूप विधान कोई भी, भला कब तक सहे)।

है नरोत्तम! ये दृश्य कितना है विकट, विकराल है,
निज बंधुओं के शीष ओर फण खोल बैठा काल है।
हर क्षण इन्हें यों देखकर, मन शोक से है जल रहा,
पल-पल कठिन संताप ये, मेरे हृदय में पल रहा।

हर अंग मेरा शिथिल होकर, शक्ति अपनी खो रहा,
अपने सगे-संबंधियों को देख है मन रो रहा।
हे सखा! देखो वो पितामह भीष्म, कुरुकल ज्येष्ठ हैं,
जो प्रेम के सागर हैं और अति वीर योद्धा श्रेष्ठ हैं।

मैं गोद में जिनकी उछल कर बैठ जाता था कभी,
कैसे है सम्भव युद्ध उनसे कर सकूँगा मैं अभी।
जिस वृक्ष की छाया में पलकर सुख अलौकिक था मिला,
हा!! काटने उसको ही विधि ने, कर दिया मुझको खड़ा।

ये भाग्य ने मुझको दिया, कैसा अनोखा दंड है,
ये अत्यधिक दुष्कर है, कितना क्रूर कर्म प्रचंड है।
ये वीरवर, तेजस्वियों में अग्रणी हैं जो खड़े,
क्या-क्या कहूँ उपकार मुझपर, कर चुके कितने बड़े।

हे कृष्ण! सच कहता हूँ, मेरे पास जो भी ज्ञान है,
सब इन्हीं की निश्छल कृपा का ही हुआ परिणाम है।
मैं तो बड़ा निर्बोध था, मुझको न कोई ज्ञान था,
न बोध था निज शक्ति का, न योग्यता का भान था।

मैं तो पड़ा था कोयले-सा, धूल में लिपटा हुआ,
मैं था शिला का खंड बस, अनगढ़, धरा पर था पड़ा।
जिस पल मुझे गुरुदेव ने निज अंक में धारण किया,
जब प्रेम का पावन अमिय, बिन स्वार्थ, बिन कारण दिया।

मैं देखते ही देखते पत्थर से हीरा हो गया,
अज्ञान का तम मेरे जीवन से सदा को खो गया।
अपने परिश्रम से मुझे पाषाण से प्रतिमा किया,
निज पुत्र सा ही जान कर, जाने कहाँ पहुँचा दिया।

मुझको प्रशिक्षण दे, बनाया धनुर्धर सर्वाग्रणी,
मैं रहूँगा पर्यंत जीवन, इस कृपा के हित ऋणी।
संसार ये जिस रूप में पहचानता है अब मुझे,
वह है मेरे गुरुदेव की ही तो दया का फल सखे!

जिसने पकड़कर हाथ, शर संधान सिखलाया मुझे,
सद्धर्म का, सत्कर्म का, सन्मार्ग दिखलाया मुझे।
जिनकी चरण रज को सदा ही शीष पर मैंने रखा,
कैसे कटेगा शीष उनका हाथ से मेरे भला??

जिस कण्ठ ने मुझको सदा, जय का दिया आशीष था,
किस भाँति उसको बाण से, मैं बींध दूँगा अब भला??
गुरुद्रोह का ही पाप भीषण है, मुझे यह ज्ञात है,
गुरुवध मुझे करना पड़े ,ये तो सघन संताप है।

इससे कहीँ भी हो सकेगा त्राण तो मेरा नहीं,
इस दुःख न मुक्त होगा प्राण ये मेरा कहीँ।

हे कृष्ण! यह सब देख के, है धनुष कर से छूटता,
ये युद्ध का संकल्प होकर क्षीण, अब है टूटता।
मुझको न तो जय चाहिए, न राज्य का ही सुख अहो!
क्या लाभ है? निज बंधुओं को मारने में फिर कहो??

ये हाय! हैं परिवार जन, निज तातसुत, मातुल, सुजन,
हैं भाई, भ्रातृज, श्वसुर हैं, गुरु हैं, पितामह, श्रेष्ठजन।
त्रैलोक्य के भी राज्य हित, इनको नहीं मारूँगा मैं,
कर पुण्य अपना क्षय, कुपथ पर पग नहीं धारूँगा मैं।

ये लोभ ज्वर से ग्रसित हैं, इनको नहीं कुछ भान है,
क्या कर रहे, क्या कर चुके, इनको न इसका ज्ञान है।
लेकिन कृपा से आपकी हम हो गए सज्ञान हैं,
संग्राम हितकारी नहीं होता, हमें यह ध्यान है।

फिर आप क्यों इस पाप में हमको फँसाते हैं प्रभो??
इस घोर दूषित कर्म में, हमको लगाते हैं प्रभो!!

संजय उवाच-
हे नृप! ये कहकर पार्थ ने है, रख दिया अपना धनुष,
रथ पृष्ठ में वह हैं गए, होकर दुखी, रण से विमुख।

।।प्रथमोध्याय समाप्त।।