अध्याय ०२
करुणा समेटे हृदय में, नयनों में अश्रु भरे हुए,
अतिदीन हो कुंतीतनय ने, ये वचन हरि से कहे।
सुनकर वचन ये वीर के, निज सखा से हरि ने कहा,
हे शूरवीर शिरोमणि! तुझको अचानक क्या हुआ??
किस मोह से पीड़ित हुआ, तू हो गया अति दीन है,
ये आचरण तेरे लिए, अति त्याज्य है, अति हीन है।
तू दीनता को त्याग दे, न कीर्तिपथ अवरुद्ध कर,
कुछ ध्यान कर सद्धर्म का, तू वीरता से युद्ध कर।
ये है नपुंसकता सखे, तुझको न शोभा दे रही,
अपना प्रबल साहस जगा, है रास्ता तेरा यही।
अर्जुन पुनः कहने लगा, हे कृष्ण! ये बतलाईए,
क्या राज लिप्सा के लिए यह कृत्य करना चाहिए?
इक भूमि के टुकड़े को पाने के लिए, केशव कहो,
गुरु, तात का वध मैं करूँ, क्या है उचित बोलो प्रभो?
इससे बहुत अच्छा है, जा कर तप करूँगा मैं कहीं,
मैं भीख लेकर खाऊंगा, कुल का करूँगा वध नहीं।**
इस तरह सबको मारकर , केशव भला क्या पाऊँगा??
जो भी मिले रण जीत कर, पर हाथ खाली जाऊँगा।
अतएव क्यों मैं तुच्छ निज हित के लिए पापी बनूँ??,
क्यों मैं सकल संसार में, निजवंश का घाती बनूँ??
हे कृष्ण! मैं अति दुःख से होकर ग्रसित, करता विनय,
निज शिष्य मुझको जानिए, ले शरण में कीजै अभय।
संजय उवाच-
राजन्!!कहे जब पार्थ ने भगवान से ऐसे वचन,
हँसते हुए कहने लगे उससे, पुनः मोहन मदन।
श्रीभगवानुवाच-
हे वीर! कैसी तू अनोखी बात करता है भला,
सुनकर जिसे उत्पन्न होता है मुझे अचरज बड़ा।
तू पंडितों-सी बात करता है सखा मेरे, मगर,
फिर मन दुखाता है स्वयं का, शोक में यूँ डूबकर।
ये लोग जिनको तू सगा अपना समझता है यहाँ,
ये सोचकर मुझको बता गत जन्म में ये थे कहाँ?
क्या तू इन्हें पहचानता भी था, तुझे क्या है पता??
इस जन्म के उपरांत, जाएँगे कहाँ मुझको बता??
ये ध्यान रख ये सब यहाँ जो हैं तुझे दिखते खड़े,
अनगिनत जन्मों से इसी संसार में उलझे पड़े।
तू भी नहीं नूतन, पुरातन जीव है तू भी सखा,
इस तत्व को ले जान, यूँ मत शोक इनका कर वृथा।
जिनको यहाँ तू देखकर, है मोह बंधन में पड़ा,
तू जानता क्या है उन्हें सत रूप में मुझको बता?
इस देह के भीतर छुपा है, भेद क्या? सुन भी ज़रा,
हाँ समझ जिसको नष्ट होगा, शोक ये सारा तेरा।
यह देह तो है यन्त्र केवल, एक जैसे म्यान है,
इसमें जो रहता जीव है, उसका न तुझको ज्ञान है।
वह तत्व जो निर्जर, अमर है, जीव-आत्मा है सखा,
शाश्वत, अलौकिक है, अजर है, जो यहाँ रहती सदा।
हाँ, दुःख-सुख का भान केवल देह को होता सदा,
पर यह अनश्वर जीव-आत्मा ,एक-सी रहती सदा।
यह जन्मती-मरती नहीं, ये न बदलती रूप है,
इस भेद तू कर गृहण, ये ज्ञान दिव्य अनूप है।
जो मर नहीं सकती कभी, क्या कोई उसका वध करे?
फिर क्यों सघन संताप लेकर, व्यर्थ तू मन में डरे??
जैसे मनुज तजकर पुराने वस्त्र, लेता है नए,
वैसे ही जीवात्मा बदलती है, पुरानी देह ये।
फिर नए वस्त्रों की तरह, यह देह नव धारण करे,
इस तथ्य को तू जान क्यों संदेह बिन कारण करे?
ना शस्त्र इसको छेदता, ना कष्ट देता है अनल,
न जल डुबोता है इसे, न सुखा सकता है अनिल।
यह तो अछेद्य, अदाह्य है, अशोष्य है, अक्लेद्य है,
मेरी समझ से भेद यह अति गूढ़ है,दुर्भेद्य है।
अव्यक्त है, ये अचिन्त्य है, है यह विकारों से परे,
जो नष्ट होता है नहीं, तू शोक उसका क्यूँ करे??
यदि जीव-आत्मा के विषय में तू नहीं कुछ जानता,
तब भी तेरा यह शोक है अनुचित, यही हूँ मानता।
यह हैं तेरे परिवारजन, पर इसी जीवन में सखा,
पिछले या अगले जन्म में, ये थे कहाँ मुझको बता??
जिसका हुआ है जन्म उसका अंत भी निश्चित समझ,
जो मर चुका, फिर जन्म लेगा, सोच में तू मत उलझ।
तू तो अलौकिक वीर है, क्यूँ हो रहा भयभीत है??
ये रास्ता तेरा नहीं, न क्षात्रकुल की रीत है!!
हर तरह से यह युद्ध तेरे धर्म के अनुकूल है,
तू त्याग करता है इसे, कितनी बड़ी यह भूल है।
यदि इस समय होकर दुखी तू छोड़ देगा रण सखा,
संसार तुझको स्मरण रख, कायर पुकारेगा सदा।
अपमान से क्या और भीषण वीर का है दुख बता?
क्यों शत्रुओं को दे रहा तू, ये अलौकिक सुख बता?
तू हो सबल धनु थाम ले, चिंता से तू क्या पाएगा?
यदि युद्ध में मर भी गया तो धाम मेरे आएगा।
सुख-दुःख को सम जानकर, रण के लिए तैयार हो,
जिससे धरा संतुष्ट हो, इसका तनिक उद्धार हो।
जो कुछ कहा मैने अभी वह ज्ञान का विस्तार है,
सुन, अब तुझे समझा रहा, क्या कर्म का आकार है।
इस गूढ़ कर्मरहस्य को, कुछ लोग ही हैं जानते,
अन्यान्य जन तो भोग को ही हैं यहाँ पहचानते।
जो स्वर्ग और अपवर्ग की लिप्सा में ही उलझे रहें,
वे कर्म के सिद्धांत की अनुशीलना कैसे करें??
जो सार है इस योग का, उसको समझना है तुझे,
अन्यत्र अवरोधों का रखकर ध्यान, बचना है तुझे।
बस है तेरा अधिकार केवल कर्म पर यह जान ले,
फल क्या मिलेगा कर्म से, इस पर तनिक मत ध्यान दे।
आसक्ति का कर त्याग, तू संबुद्ध होकर कर्म कर,
सब ओर से मन को हटा, निर्वाह अपना धर्म कर।
जो है हुआ अब तक नहीं, उसपे तेरा क्या ज़ोर है,
विधि की अलग ही चाल है, जिसका न कोई ठौर है।
तू है धनंजय, रणकुशल, है लक्ष्य भेदन में अटल,
धर धीर, मन को साध ले, कर्तव्य पथ पर हो अचल।
सुख-दुःख, लाभालाभ में, जय-पराजय में, एक हो,
मत शोक, चिन्ता, दुःख में, अपना विलक्ष विवेक खो।
अब समझ ले इस भेद को, जो तुझे बतलाता हूँ मैं,
संसार में ही मुक्ति का यह, मार्ग दिखलाता हूँ मैं।
जो कर्मफल आसक्त है, रुचिहीन निज उद्धार में,
वह तो सदा रहता फँसा, इस व्यूह-से संसार में।
जो आस में फल की हुआ हो, कर्म वो निःसार है,
यह काम योगी का नहीं, ये तो जगत व्यापार है।
जो कर्म के उपरांत करता, कर्मफल की मांग है,
छलता स्वयं को ही, स्वयं के साथ करता स्वांग है।
हाँ है उचित यह,कर्म का फल प्राप्त होना चाहिए,
पर मन न कर्ता का तनिक यूँ, आप्त होना चाहिए।
जो लालसा में है सना वह कर्म तो फलता नहीं,
ज्यों अश्व कोई काठ का ,पग एक भी चलता नहीं।
फल ही जिसे बस चाहिए, वह तो बड़ा दुर्बुद्ध है,
हर कर्म उसका हीन है, है निंदनीय, अशुद्ध है।
वह कर्मबन्धन में फँसा फिर मुक्त होता है नहीं,
पथभ्रष्ट होता, ज्ञान से फिर युक्त होता है नहीं।
जो इंद्रियों का दास बनकर कर्म करता है यहाँ,
वह मुक्ति की इस राह पर फिर पाँव धरता है कहाँ??
हे मित्र मेरे! हे परंतप! मोह तज, स्थितप्रज्ञ हो,
जिससे बने हर कर्म पावन, दिव्य जैसे यज्ञ हो।
है वीर वह, क्षत्रिय वही, मन से न माने हार जो,
संकट पड़े जो सामने, उसको करे स्वीकार जो।
तू वीरकुल भूषण है मेरे सखा, इसका ध्यान धर,
जो आ पड़े स्वीकार ले बस ईश आज्ञा मानकर।
तू वीर है! तू श्रेष्ठ है! ये अतः तेरा धर्म है,
संसार का उद्धार हो जिससे वही शुभकर्म है।
निःशंक होकर तू वरण कर इस सुअवसर का सखा,
संसार को दे त्राण का वरदान ,निज साहस जगा।
जो स्वार्थपरता से विलग होकर, निबाहे धर्म को,
वह सिद्ध योगी ही, समझ पाता जगत के मर्म को।
मत चेतना से हीन बन, निजलाभ केवल साधकर,
नर जन्म पाकर दिव्य तू, मत घोर ये अपराध कर।
मन अश्व की वल्गा पकड़, कर वश इसे हे वीरवर!
भटके यदि सद्धर्म से, ला सुपथ पर फिर खींचकर।
पशुबुद्धि का है काम बस, निजलाभ केवल साधना,
तू है प्रबुद्ध सखा ज़रा, कर सिद्ध परहित कामना।
इस कीच से जब बुद्धि तेरी मुक्ति को पा जाएगी,
यह ज्ञान की गंगा ह्रदय तेरा विमल कर जाएगी।
स्थिर बुद्धि जब धारण करेगा, मुक्ति तू भी पाएगा,
फिर लौट कर संसार के भवबन्ध में ना आएगा।
अर्जुन उवाच-
केशव बताओ थिर मति, क्या आचरण करता भला?
क्या बोलता, क्या सोचता, लक्षण कहो उसके ज़रा।
कहते किसे स्थिप्रज्ञ हैं, मुझको तनिक बतलाइए,
यह तत्व क्या है, कर कृपा मुझको तनिक समझाइए।
सुनकर विनय पृथुपुत्र की, फिर कृष्ण यों कहने लगे,
ज्यों द्रवित हो निर्झर किसी, गिरिगुहा से बहने लगे।
हे मित्र! जो निज कामना कर भस्म, करता यज्ञ है,
संसार में निष्काम कहलाता, वही स्थितप्रज्ञ है।
उद्विग्न जो दुख में नहीं ,सुख में न खोता धीर है,
निज राग, भय, को जीतता, जग में कहाता वीर है।
लेकिन बड़ी उस वीर से भी एक ऐसी शक्ति है,
करती पराजित जो उसे, उसकी छुपी आसक्ति है।
आसक्ति के आधीन होकर, बुद्धि नर खोता सदा,
पर मोल इसका अंततः होता चुकाना है बड़ा।
भ्रम में फंसा आसक्त नर, स्वाधीन रहता है नहीं,
वह दास होकर दुःख फिर क्या-क्या कहो सहता नहीं।
अतएव नर को चाहिए, वह इंद्रियों पर वश करे,
अधीन कर के इंद्रियों को, प्राप्त जग में यश करे।
अन्यथा माया में उलझकर बुद्धि तो फिर जाएगी,
सद्धर्म से तुझको हटाकर, कुपथ पर ले जाएगी।