आदमी...
जब से संरचना हुई है संसार की।
बात तब से ही है विचार की।
के, प्रकृति ने बराबरी से किया सबका पोषण,
सहेज संवारा हर रचना को , दिया समान ही तोषण।
फिर ये देखकर हैरानी हुई, के कोई वहीँ पर रुक नहीं।
उसे प्रकृति ने जहाँ छोड़ा वहीँ पर झुका नहीं।
तो , समय को भी पछाड़कर,
दुर्गमता को। ललकार कर।
रखता चला गया काल के माथे पर चरण,
आदमी आगे निकल गया।
थे दो ही हथियार उसके,
अस्तित्व की इस जंग में।
नियंता की इस भेंट का उपयोग कर।
भलीभांति, सूझ बूझ से प्रयोग कर।
बुद्धि और भुजाओ का जोर लगाकर।
जो आया पथ में सामने उसे हटाकर।
्करता चला गया निरंतर विजय का वरण।
आदमी बढ़ता चला गया।
विजय यात्रा उसकी यहीं पर रुकी नहीं।
महत्त्वाकांक्षा मूल्यों के आगे भी झुकी नहीं।
तो,
लगाकर आग मर्यादाओं में।
वो सेंकता चला गया स्वार्थ गूंथी रोटियाँ।
और,
गुज़रते वक़्त ने बढाया न केवल,
गति को, प्रगति को।
अपितु बदल के रख दिया पुरी मनःस्थिति को।
उसकी भूख कुछ यों बढ़ी,
ग्राह्य जो भी मिला सब निगल गयी।
और अब,
संवेदनाओ को जलाकर।
निज चेतना को भुलाकर।
मूल्यों को, मर्यादाओं को आग लगाकर।
आदमी जीता है, बस आदमी को "खा कर"।ं
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