मंजिल और मैं...
बस चला ही जा रहा हूँ,
किसी सफर पर,
मैं खेलता लुका छुपी।
लक्ष्य मेरे अब, छलावे लग रहे हैं,
जैसे मृग को रेत में भी पानी दिखता है।
या,
क्षितिज की कोई कल्पना,
जहाँ मिलेगा व्योम धरा से।
नभ के ऊपर किसी स्वर्ग की एक कथा में,
खुद को भी मैं शायद देख रहा होता हूँ।
पग पग से दूरी के सागर को फिर भरता,
हूँ मैं चलता रहता अविरल पथ पर अपने।
पर ये दूरी फिर भी कायम क्यूँ रहती है,
लुका छुपी भी बस यूँ ही चलती रहती है।
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