hamarivani badge

a href="http://www.hamarivani.com/update_my_blogg.php?blgid=4653" target="_blank">www.hamarivani.com

Wednesday, 14 February 2018

शहर...अब नहीं रहा वैसा!!

"शहर अब नहीं रहा वैसा"

न तो ज़मीं बदली,
न आसमाँ का रंग।

समा सारा लेकिन बदल सा गया है।
अब नहीं दौड़ता कोई यहां तितलियों के पीछे,

किवाड़ सभी बंद हैं, और खिड़कियाँ सटी हुई।
अब सीखते हैं, बच्चे भी बाँटना "तेरे और मेरे" हिस्सों को।

शहर अब नहीं रहा वैसा।

अब भीड़ भी नहीं होती है त्योहारों में।
न तो गाड़ियों का जाम लगता है बाज़ारों में।

धूल बस अपने साथ लिए तन्हाई, नापती है गालियाँ।
दिल सभी सोए से हैं, लोग भी खोए से हैं।
अब दुनिया भी सिमटने लगी है, शायद "चारदीवारी" में।

शहर अब नहीं रहा वैसा।

अब ख़त्म हो गयी है वो मिठास,
जो गुझिया से ज़ुबाँ तक जाती थी।
ज़ुबाँ से दिल और दिलों से घरों में फ़ैल जाती थी।

"दाम कुछ इस क़दर भी नहीं बढे हैं शक्कर के अभी",
पर शायद अब चूल्हे तंग से हो गए हैं।

शहर अब नहीं रहा वैसा।

-अंशुल।

No comments:

Post a Comment