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Wednesday, 14 February 2018

बुझती रात! उगते तारे...

बुझती रात के उगते तारे!!

एक बार पूछा मैंने,
ओ! बुझती रात के उगते तारे।

क्यूँ तू उगा गहन तिमिर में?
आखिर क्या मंशा है तेरी?

छोटा सा है जीवन तेरा,
और, ये लंबी रात घनेरी।

हुआ जन्म तेरा जिसमें, वो
प्रहर बीतने वाला है।

चंद पलों में रवि प्रकाश।
तुझको खा जाने वाला है।

ओ! बुझती रात के उगते तारे।

उदित हुआ तू किस इच्छा से,
कौन कामना लेकर मन में।

दुर्दम रण करने आया है,
अपने छोटे से जीवन में।

मुझे निरर्थक ही लगता है,
प्रकट वृथा परिकल्प ये तेरा।

तुझे लीलने , है प्रकाश इक ओर,
तो दूजी ओर अँधेरा।

ऐ! बुझती रात के उगते तारे।

पथ को रोके घनी घटा ये,
सबल खड़ी है, ये मत भूल।

सघन ओट इसकी ढँक लेगी,
तुझको प्यारे, ये मत भूल।

अतः, भ्रमित हो रह जाएगा।
जीवन यूँ ही कट जाएगा!
सोच अंत में क्या पाएगा??

ऐ! बुझती रात के उगते तारे।

सुन कर मेरी बात ठिठोली सी,
हंस पड़ा अचानक वो।

फिर बोला वो मुझसे, हे मानव।

जो भी कहा सत्य है तूने।
पर समझा क्या ये भी तूने।

मेरा ये लघु जीवन ही,
आदर्श है सदा महापुरुषों का।

मेरे नभ में आते ही कई योगी जन उठ जाते हैं।
फिर, अपने कर्म की अग्नि जला, जो आप रवि बन जाते हैं।

दर्शन कर के मेरा ही रवि की उर्जा निखरती है।
उसके ही पश्चात धरा पर नूतन किरण बिखरती हैं।

मैं ही दूत भोर का भी हूँ, मैं ही तम का नाशक हूँ।
रात को प्रातः करने वाले, संदेसे का वाहक हूँ।

मैं ही हूँ वो क्रान्ति ज्योति,जो
अंधियारे से टकराती है।

चोट निशा के अहं पे कर,
उजियारे में छुप जाती है।

मेरे जीवन का अंत कदापि,
व्यर्थ न किसी विधि जाता है।
ये मेरा बलिदान ही है जो,
दिनमणि को ले आता है।

जब तक जीता सभी के मन को।
आनंद से भर जाता हूँ।
अपने क्षणिक जीवन के होते,
भी बस मुस्कुराता हूँ।

बस इसको ही मान स्वयं पर मैं,
विधाता का वरदान।
पूर्ण शान्ति से, गर्व से भर कर,
करता हूँ मैं चिर विश्राम।

बातें सुन उसकी सारी,
मैं बोल ही पड़ा अचानक के।

धन्य तेरा जीवन है प्यारे,
सत्य ही तेरा कथन है प्यारे।

ऐ, बुझती रात के उगते तारे।

-अंशुल।

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