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Wednesday, 14 February 2018

आदमी

आदमी...

जब से संरचना हुई है संसार की।
बात तब से ही है विचार की।

के, प्रकृति ने बराबरी से किया सबका पोषण,
सहेज संवारा हर रचना को , दिया समान ही तोषण।

फिर ये देखकर हैरानी हुई, के कोई वहीँ पर रुक नहीं।
उसे प्रकृति ने जहाँ छोड़ा वहीँ पर झुका नहीं।

तो , समय को भी पछाड़कर,
दुर्गमता को। ललकार कर।

रखता चला गया काल के माथे पर चरण,
आदमी आगे निकल गया।

थे दो ही हथियार उसके,
अस्तित्व की इस जंग में।
नियंता की इस भेंट का उपयोग कर।
भलीभांति, सूझ बूझ से प्रयोग कर।

बुद्धि और भुजाओ का जोर लगाकर।
जो आया पथ में सामने उसे हटाकर।
्करता चला गया  निरंतर विजय का वरण।
आदमी बढ़ता चला गया।

विजय यात्रा उसकी यहीं पर रुकी नहीं।
महत्त्वाकांक्षा मूल्यों के आगे भी झुकी नहीं।
तो,
लगाकर आग मर्यादाओं में।
वो सेंकता चला गया स्वार्थ गूंथी रोटियाँ।
और,
गुज़रते वक़्त ने बढाया न केवल,
गति को, प्रगति को।
अपितु बदल के रख दिया पुरी मनःस्थिति को।

उसकी भूख कुछ यों बढ़ी,
ग्राह्य जो भी मिला सब निगल गयी।

और अब,
संवेदनाओ को जलाकर।
निज चेतना को भुलाकर।
मूल्यों को, मर्यादाओं को आग लगाकर।

आदमी जीता है, बस आदमी को "खा कर"।ं

बुझती रात! उगते तारे...

बुझती रात के उगते तारे!!

एक बार पूछा मैंने,
ओ! बुझती रात के उगते तारे।

क्यूँ तू उगा गहन तिमिर में?
आखिर क्या मंशा है तेरी?

छोटा सा है जीवन तेरा,
और, ये लंबी रात घनेरी।

हुआ जन्म तेरा जिसमें, वो
प्रहर बीतने वाला है।

चंद पलों में रवि प्रकाश।
तुझको खा जाने वाला है।

ओ! बुझती रात के उगते तारे।

उदित हुआ तू किस इच्छा से,
कौन कामना लेकर मन में।

दुर्दम रण करने आया है,
अपने छोटे से जीवन में।

मुझे निरर्थक ही लगता है,
प्रकट वृथा परिकल्प ये तेरा।

तुझे लीलने , है प्रकाश इक ओर,
तो दूजी ओर अँधेरा।

ऐ! बुझती रात के उगते तारे।

पथ को रोके घनी घटा ये,
सबल खड़ी है, ये मत भूल।

सघन ओट इसकी ढँक लेगी,
तुझको प्यारे, ये मत भूल।

अतः, भ्रमित हो रह जाएगा।
जीवन यूँ ही कट जाएगा!
सोच अंत में क्या पाएगा??

ऐ! बुझती रात के उगते तारे।

सुन कर मेरी बात ठिठोली सी,
हंस पड़ा अचानक वो।

फिर बोला वो मुझसे, हे मानव।

जो भी कहा सत्य है तूने।
पर समझा क्या ये भी तूने।

मेरा ये लघु जीवन ही,
आदर्श है सदा महापुरुषों का।

मेरे नभ में आते ही कई योगी जन उठ जाते हैं।
फिर, अपने कर्म की अग्नि जला, जो आप रवि बन जाते हैं।

दर्शन कर के मेरा ही रवि की उर्जा निखरती है।
उसके ही पश्चात धरा पर नूतन किरण बिखरती हैं।

मैं ही दूत भोर का भी हूँ, मैं ही तम का नाशक हूँ।
रात को प्रातः करने वाले, संदेसे का वाहक हूँ।

मैं ही हूँ वो क्रान्ति ज्योति,जो
अंधियारे से टकराती है।

चोट निशा के अहं पे कर,
उजियारे में छुप जाती है।

मेरे जीवन का अंत कदापि,
व्यर्थ न किसी विधि जाता है।
ये मेरा बलिदान ही है जो,
दिनमणि को ले आता है।

जब तक जीता सभी के मन को।
आनंद से भर जाता हूँ।
अपने क्षणिक जीवन के होते,
भी बस मुस्कुराता हूँ।

बस इसको ही मान स्वयं पर मैं,
विधाता का वरदान।
पूर्ण शान्ति से, गर्व से भर कर,
करता हूँ मैं चिर विश्राम।

बातें सुन उसकी सारी,
मैं बोल ही पड़ा अचानक के।

धन्य तेरा जीवन है प्यारे,
सत्य ही तेरा कथन है प्यारे।

ऐ, बुझती रात के उगते तारे।

-अंशुल।

नव वर्ष गीत

नव वर्ष।

पतझड़ के झड़े पात,
बीती बोझिल सी रात।
कोकिल के कंठ से फिर,
फूटा नव युगल राग।

आयो मंगल प्रभात,
नवल तेज, कांति लिए।
बरस रहा है प्रकाश,
अद्भुत सी शांति लिए।

छिटक पड़ी ज्यों नभ की,
रौशनी भरी गागर।
धूप की निकली धारा,
फैल गया उजियारा।

जागे हैं नींद से फिर,
उद्यम, बल, शील, ज्ञान।
करने निर्माण नवल,
एक जुट हुए प्राण।

आनंद भरपूर हुआ,
गूंज है गीत नया।
आया है वर्ष नया,
मन छायो हर्ष नया।

भूलें जो बीत गया,
तज दें जो रीत गया।

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें।

-अंशुल।

वह जवानी क्या???

वह जवानी क्या??

वह जवानी क्या? के जो ना कर रही निर्माण हो।
वह जवानी क्या? के जो ना चढ़ रही परवान हो।
जो डिगा ना दे, गिरि को अपनी बस हुंकार से।
वह जवानी क्या? के जो ना कर रही उत्थान हो।

जो न बेड़ी डाल दे अविजित रिपु के पाँव में।
चीर धरती जो निकाले सुख, दुःखों की छाँव में।
जो न दहला दे अरिदल को महज़ ललकार से।
वह जवानी क्या? के जो ना शौर्य का परिमाण हो।

जो उठाये हाथ ना ढोने किसी के भार को।
जो न कर पाए प्रकाशित तेज से संसार को।
जो न आए सामने, निर्भीक हो प्रतिकार से।
वह जवानी क्या? के जिसका ध्येय ना परित्राण हो।

-अंशुल।

परित्राण- कष्ट से मुक्ति दिलाना।
परिमाण- मात्र, या नाप।
प्रतिकार- विरोध।
अरिदल- शत्रु का समूह।
अविजित रिपु- अजेय शत्रु।
ध्येय- लक्ष्य।

अवध की होली

होली पर रंग भरी अयोध्या की झाँकी।

हनुमत धावें रंग भक्ति के लगाए और,
लखन ने आज रंग सेवा के लगाए हैं।।

भरत ने त्याग रंगा, शत्रुघन शौर्य रंगे,
कपिराज आज मीत रंग रंगे आए हैं।।

सुत प्रेम रंग रँगी माता श्री कौसल्या आज,
पिता दसरत्थ रंग गर्व के लगाए हैं।।

निज जन हेतु प्रीत पावन के रंग रँगे,
जानकी रमण आज फूले न समाए हैं।।

अवध निवासी जन आनंद मगन सब,
रंग सुख-स्नेह के गगन भर छाए हैं।।

ऐसो मनहर देख देख दृश्य हतप्रभ,
देव, देवलोक तज, अवध में आए हैं।।

इंद्र संग देवदल, नृत्य में मगन सब,
जान के ये बात, ब्रम्हदेव हर्षाए हैं।।

कालहुँ के काल महाकाल, प्रेम रंग मय,
झूम झूम रूप नटराज का बनाए हैं।।

उम्मीद सजाए रखना!!

अपनी उम्मीद सजाए रखना।
यूँ न इस दिल को बुझाए रखना।
रास्ते ख़त्म भी हो जाएंगे,
जोश क़दमों का बनाए रखना।

जहाँ बदल गया बाज़ारों में,
ज़मीर अपना बचाए रखना।

वो आज खुश है मेरे आने से,
खुदा! भरम ये बनाए रखना।

ज़माना देखकर कुरेदेगा,
दिलों के ज़ख्म छुपाए रखना

ठोकरें ही जो दिल को दें उनसे,
भला क्या दिल को लगाए रखना।

लौट कर आऊँगा , वादे को मेरे,
घर की चौखट पे चरागों सा जलाए रखना।

-अंशुल।

मंज़िल और मैं

मंजिल और मैं...

बस चला ही जा रहा हूँ,
किसी सफर पर,
मैं खेलता लुका छुपी।

लक्ष्य मेरे अब, छलावे लग रहे हैं,

जैसे मृग को रेत में भी पानी दिखता है।
या,
क्षितिज की कोई कल्पना,
जहाँ मिलेगा व्योम धरा से।

नभ के ऊपर किसी स्वर्ग की एक कथा में,
खुद को भी मैं शायद देख रहा होता हूँ।

पग पग से दूरी के सागर को फिर भरता,
हूँ मैं चलता रहता अविरल पथ पर अपने।

पर ये दूरी फिर भी कायम क्यूँ रहती है,
लुका छुपी भी बस यूँ ही चलती रहती है।