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Thursday, 6 December 2018

तुम्हारा साथ...

तुम्हारा साथ है,
जैसे भरोसा,
भरोसा जो भी होगा,
ठीक होगा।।

तुम्हारा साथ है,
जैसे दिलासा,
दिलासा ये कि मंज़िल,
मंज़िल पास होगी।

तुम्हारा साथ है,
मंदाकिनी-सा,
भरी है जिसमें शीतलता,
अनोखी।

तुम्हारा साथ है,
तारावली-सा,
प्रकाशित जिससे जीवन,
का ये पथ है।

तुम्हारा साथ है,
गीतावली-सा,
है गुंजित गीत-सा हर,
शब्द जिसका।

तुम्हारा साथ है,
जीवन का संबल,
है मुश्किल राह भी,
आसान जिससे।

- अंशुल।।

हिंदी दिवस!!!

हिंदी दिवस की सह्रदय बधाई....
हिंदी हम सबके मन की भाषा है ,विचारों की आत्मा है, शब्दों का प्राण है और अभिव्यक्ति का वरदान है। फिर भी हम हिंदी का दिन मनाते हैं ,ये अफ़सोस की बात है।

आज के अवसर पर एक व्यंग्यात्मक कविता...(शायद हम सब की सत्यता पर आधारित),
********************

बड़ा गर्व है आज हमें,हम हिंदी दिवस मानते हैं।
सुनकर, पढ़कर, हिंदी को हम आज बड़े हर्षाते हैं।

वसे हम हैं बड़े मॉडर्न पर संस्कारी भी तो हैं,
हिंदी की महिमा मण्डित करने में ज़ोर दिखाते हैं।

व्हाट्सएप्प हो या फ़ेसबुक के स्टेटस में या स्टोरी में,
अच्छी-अच्छी चार पंक्तियाँ, शिद्दत से चिपकाते हैं।

हिंदी के बिन क्या होगा, इस सकल जगत का सोचो तो,
कुछ ऐसे गंभीर प्रश्न कर, चिन्ता ख़ूब जताते हैं।

भीड़ जुटा, संगठन बनाकर, आयोजित एक बैठक कर,
पारंपरिक ढंग से सजने, कुर्ता प्रेस कराते हैं।

खादी की 'बादामी' अचकन, अपने तन पर धारण कर,
हिंदी समारोह में जाने को, तत्पर हो जाते हैं।

वहाँ बुलाकर किसी वृद्ध लेखक को, मंचासीन बना,
कितने हम भाषा प्रेमी हैं, लोगों को दिखलाते हैं।

और इस तरह कुछ घंटों में प्रेम जताकर हिंदी पर,
खाना खा-कर, छुट्टी पा-कर, अपने घर को जाते हैं।

बड़ी ख़ुशी की बात है हम, अपनी भाषा पर मान करें,
पर है दुःखप्रद बात अन्य दिन उसका हम अपमान करें।

बड़ा ढिंढोरा पीटें, दिन एक उत्सव खूब मनाएँ हम,
और अन्य दिन उस भाषा को बोलें और लजाएँ हम।

सोचो यदि होटल में जाकर हिंदी हम बोलेंगे,
सुनने वाले क्या सोचेंगे, हमको कैसे तौलेंगे।

और पार्टियों में जाकर जब हिंदी में बतियाओगे,
अपनी इज़्ज़त को क्या ख़ुद ही मिट्टी में मिलवाओगे,
ताने देंगे 'सुधिजन' तुमको, अनपढ़ ही कहलाओगे।

ऐसे क्षुद्र विचार लिए, हम समुन्नत कहलाते हैं,
प्रगत बुद्धि पर अपनी देखो, रह-रहकर इठलाते हैं।

सम्मेलन करने से बेहतर है संकल्प उठाएँ हम,
निज भाषा पर गर्व करें, मन से हिंदी अपनाएँ हम।

- अंशुल तिवारी।
(हिंदी दिवस विशेष)
...१४.०९.२०१७....

Wednesday, 5 December 2018

तलाश

पराये इस शहर में दिल चला फिर ढूंढने अपना कोई,
तलाश-ए-अंजुमन फिर रह गयी बेकार ही, बेज़ार ही.

किया क्या कुफ्र जो नादान ने खुद को ज़रा बहला लिया,
के बस चाहा था करना ज़िन्दगी गुलफाम ही, गुलज़ार ही.

मुक़द्दर के लिफाफे में था क्या रक्खा मेरी खातिर सनम,
नियामत बताकर दे गया सुलगे हुए अंगार ही.

रह-ए-गुज़र पर थे मिले जो चेहरे मुझको यहाँ,
ग़म बांटने के बस लगे थे सबपे इश्तेहार ही.

मिला न कोई अपना इस भरे बाजार की सी भीड़ में,
चला था साथ जिसके रह, गयी बस साथ में तन्हाई ही.

मैं भागता हूँ!!

मैं भागता हूँ।।

कभी कुछ पा जाने को,
किसी का हो जाने को।
कभी तो रूठ जाने को ,
कभी उसको मनाने को।
कभी दिल की सुनाने को,
कभी कुछ गुनगुनाने को।
कभी आंसू बहाने को,
तो कभी मुस्कुराने को।

मैं भागता हूँ,,

बाहों में सामाने को,
या पलकों पे उठाने को।
कभी कुछ पल चुराने को,
या फिर सब कुछ लुटाने को।
कभी बस डूब जाने को,
या उठ कर पार जाने को।
कभी कुछ याद करने को,
कभी कुछ भूल जाने को।

मैं भागता हूँ,,

कहीं पर पहुँच जाने को,
या वापस लौट आने को।

मैं भागत हूँ,,

कभी सब छोड़ जाने को,,

और कभी,,,......खुद से ही।

Tuesday, 4 December 2018

प्रतिशोध!!!

अपने भीतर छुपे तेज का होना बोध ज़रूरी है,
जीवन है रण सघन जगत में, तो प्रतिशोध ज़रूरी है।

सरल हृदय ने, मधुर वचन से, अब तक था संवाद किया,
सुनकर इसने कठिन शब्द भी, हँसकर ही प्रतिवाद दिया।

कुंद मना जन लेकिन इसको दुर्बलता ही मान गए,
मन के शुभ संकल्पों को ये, कायरता ही जान गए।

शांति, प्रेम की बोली को ये, हार तुम्हारी मान गए,
और विनयनत ग्रीवा को लाचार, तुम्हारी मान गए।

शब्द शिष्टता की सीमा से जब आगे बढ़ जाते हों,
तब निज स्वाभिमान के ख़ातिर, कुछ प्रतिरोध ज़रूरी है।

वो टूटा तारा!!

वो चमका था अंधेरी, स्याह शब में,
किसी को उसने था रस्ता दिखाया,
किसी का वो था बिछड़ा मीत जैसे,
किसी की रात का वो था सहारा,
किसी की मौज-ए-ग़म का था किनारा,
किसी के दिल का था वो एक टुकड़ा,
किसी की आँख का था नूर शायद,
किसी का वो सुनहरा ख़्वाब ही था,
किसी की ज़िंदगी की था वो मंज़िल,
किसी के दिल बहलने की वजह था,
किसी सीने को ठंडक की तरह था,
किसी आवारगी का था वो साथी,
किसी बुझते दिए कि था वो हिम्मत,
किसी उजड़े हुए खंडहर की रौनक,
किसी जलती शमाँ का हौसला था,
किसी के लिए बस इक सिलसिला था,

मग़र, वो था नहीं बस एक तारा,
किसी की थी वो जैसे सारी दुनिया।

कई धागे जुड़े थे उससे सबके,
सभी के ही जुड़े उससे थे रिश्ते।

मेरी भी थी उसी से एक ख़्वाहिश,
जो मैं चाहूँ वही दे जाए मुझको।

यही बस सोचकर देखा जो मैंने,
मेरी चाहत को ही करने मुकम्मल,
फ़लक से टूटकर यों गिर पड़ा वो,
मिला यों धूल में टूटा वो तारा,

मैं था हैरान के ये क्या हुआ था??
मेरी ख़्वाहिश हुई थी क्या मुकम्मल??
या टूटी थी, न जाने कितनीं दुनिया?

-अंशुल तिवारी।
हरिद्वार/ 04.12.18

Sunday, 2 December 2018

धूलि ब्रजधाम की!!

देवन्ह को दुर्लभ, सुर को सुलभ नाहिं,
ईश्वर को इच्छित है, धूलि ब्रजधाम की।
हरिपद अवतरी, गंग सम भावति है,
कृष्ण पद राजति ये, धूलि ब्रजधाम की।
चौदह भुवन तीन, लोक सब हारि गए,
हरि मन भाई है ये, धूलि ब्रजधाम की।
जप, तप, यज्ञ, दान, जेते कर्म ये महान,
फल योग सबको है, धूलि ब्रजधाम की।

- अंशुल तिवारी
(ब्रजधाम दर्शन)