हिंदी दिवस की सह्रदय बधाई....
हिंदी हम सबके मन की भाषा है ,विचारों की आत्मा है, शब्दों का प्राण है और अभिव्यक्ति का वरदान है। फिर भी हम हिंदी का दिन मनाते हैं ,ये अफ़सोस की बात है।
आज के अवसर पर एक व्यंग्यात्मक कविता...(शायद हम सब की सत्यता पर आधारित),
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बड़ा गर्व है आज हमें,हम हिंदी दिवस मानते हैं।
सुनकर, पढ़कर, हिंदी को हम आज बड़े हर्षाते हैं।
वसे हम हैं बड़े मॉडर्न पर संस्कारी भी तो हैं,
हिंदी की महिमा मण्डित करने में ज़ोर दिखाते हैं।
व्हाट्सएप्प हो या फ़ेसबुक के स्टेटस में या स्टोरी में,
अच्छी-अच्छी चार पंक्तियाँ, शिद्दत से चिपकाते हैं।
हिंदी के बिन क्या होगा, इस सकल जगत का सोचो तो,
कुछ ऐसे गंभीर प्रश्न कर, चिन्ता ख़ूब जताते हैं।
भीड़ जुटा, संगठन बनाकर, आयोजित एक बैठक कर,
पारंपरिक ढंग से सजने, कुर्ता प्रेस कराते हैं।
खादी की 'बादामी' अचकन, अपने तन पर धारण कर,
हिंदी समारोह में जाने को, तत्पर हो जाते हैं।
वहाँ बुलाकर किसी वृद्ध लेखक को, मंचासीन बना,
कितने हम भाषा प्रेमी हैं, लोगों को दिखलाते हैं।
और इस तरह कुछ घंटों में प्रेम जताकर हिंदी पर,
खाना खा-कर, छुट्टी पा-कर, अपने घर को जाते हैं।
बड़ी ख़ुशी की बात है हम, अपनी भाषा पर मान करें,
पर है दुःखप्रद बात अन्य दिन उसका हम अपमान करें।
बड़ा ढिंढोरा पीटें, दिन एक उत्सव खूब मनाएँ हम,
और अन्य दिन उस भाषा को बोलें और लजाएँ हम।
सोचो यदि होटल में जाकर हिंदी हम बोलेंगे,
सुनने वाले क्या सोचेंगे, हमको कैसे तौलेंगे।
और पार्टियों में जाकर जब हिंदी में बतियाओगे,
अपनी इज़्ज़त को क्या ख़ुद ही मिट्टी में मिलवाओगे,
ताने देंगे 'सुधिजन' तुमको, अनपढ़ ही कहलाओगे।
ऐसे क्षुद्र विचार लिए, हम समुन्नत कहलाते हैं,
प्रगत बुद्धि पर अपनी देखो, रह-रहकर इठलाते हैं।
सम्मेलन करने से बेहतर है संकल्प उठाएँ हम,
निज भाषा पर गर्व करें, मन से हिंदी अपनाएँ हम।
- अंशुल तिवारी।
(हिंदी दिवस विशेष)
...१४.०९.२०१७....
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