पराये इस शहर में दिल चला फिर ढूंढने अपना कोई,
तलाश-ए-अंजुमन फिर रह गयी बेकार ही, बेज़ार ही.
किया क्या कुफ्र जो नादान ने खुद को ज़रा बहला लिया,
के बस चाहा था करना ज़िन्दगी गुलफाम ही, गुलज़ार ही.
मुक़द्दर के लिफाफे में था क्या रक्खा मेरी खातिर सनम,
नियामत बताकर दे गया सुलगे हुए अंगार ही.
रह-ए-गुज़र पर थे मिले जो चेहरे मुझको यहाँ,
ग़म बांटने के बस लगे थे सबपे इश्तेहार ही.
मिला न कोई अपना इस भरे बाजार की सी भीड़ में,
चला था साथ जिसके रह, गयी बस साथ में तन्हाई ही.
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