अपने भीतर छुपे तेज का होना बोध ज़रूरी है,
जीवन है रण सघन जगत में, तो प्रतिशोध ज़रूरी है।
सरल हृदय ने, मधुर वचन से, अब तक था संवाद किया,
सुनकर इसने कठिन शब्द भी, हँसकर ही प्रतिवाद दिया।
कुंद मना जन लेकिन इसको दुर्बलता ही मान गए,
मन के शुभ संकल्पों को ये, कायरता ही जान गए।
शांति, प्रेम की बोली को ये, हार तुम्हारी मान गए,
और विनयनत ग्रीवा को लाचार, तुम्हारी मान गए।
शब्द शिष्टता की सीमा से जब आगे बढ़ जाते हों,
तब निज स्वाभिमान के ख़ातिर, कुछ प्रतिरोध ज़रूरी है।
No comments:
Post a Comment