वो चमका था अंधेरी, स्याह शब में,
किसी को उसने था रस्ता दिखाया,
किसी का वो था बिछड़ा मीत जैसे,
किसी की रात का वो था सहारा,
किसी की मौज-ए-ग़म का था किनारा,
किसी के दिल का था वो एक टुकड़ा,
किसी की आँख का था नूर शायद,
किसी का वो सुनहरा ख़्वाब ही था,
किसी की ज़िंदगी की था वो मंज़िल,
किसी के दिल बहलने की वजह था,
किसी सीने को ठंडक की तरह था,
किसी आवारगी का था वो साथी,
किसी बुझते दिए कि था वो हिम्मत,
किसी उजड़े हुए खंडहर की रौनक,
किसी जलती शमाँ का हौसला था,
किसी के लिए बस इक सिलसिला था,
मग़र, वो था नहीं बस एक तारा,
किसी की थी वो जैसे सारी दुनिया।
कई धागे जुड़े थे उससे सबके,
सभी के ही जुड़े उससे थे रिश्ते।
मेरी भी थी उसी से एक ख़्वाहिश,
जो मैं चाहूँ वही दे जाए मुझको।
यही बस सोचकर देखा जो मैंने,
मेरी चाहत को ही करने मुकम्मल,
फ़लक से टूटकर यों गिर पड़ा वो,
मिला यों धूल में टूटा वो तारा,
मैं था हैरान के ये क्या हुआ था??
मेरी ख़्वाहिश हुई थी क्या मुकम्मल??
या टूटी थी, न जाने कितनीं दुनिया?
-अंशुल तिवारी।
हरिद्वार/ 04.12.18
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