देवन्ह को दुर्लभ, सुर को सुलभ नाहिं,
ईश्वर को इच्छित है, धूलि ब्रजधाम की।
हरिपद अवतरी, गंग सम भावति है,
कृष्ण पद राजति ये, धूलि ब्रजधाम की।
चौदह भुवन तीन, लोक सब हारि गए,
हरि मन भाई है ये, धूलि ब्रजधाम की।
जप, तप, यज्ञ, दान, जेते कर्म ये महान,
फल योग सबको है, धूलि ब्रजधाम की।
- अंशुल तिवारी
(ब्रजधाम दर्शन)
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