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Monday, 2 April 2018

क्यूँ ज़रूरी होता है?

सन्दर्भ:
कभी कभी सत्य को भुला देने में ही व्यवहारिकता होती है।
पर क्या ये उचित है?? ये कहाँ तक उचित है??
क्या इसी तर्ज पर सत्य को भूल अन्याय सहना उचित है?
इसी प्रश्न को उठाती हुई ये कविता...

क्यूँ ज़रूरी होता है?
अक्सर,

रगों में खौलते- उबलते सत्य को,
रोक लेना, आँखों में ही।
पीस कर रख देना,
दांतों के बीच।

या, फिर छुपा लेना,
किसी पुराने ज़ख़्म की तरह।
चेहरे की निर्जीव, मृत मुस्कराहट के पीछे।

क्यूँ ज़रूरी होता है?
अक्सर,
ह्रदय में उभरते, कौंधते सत्य को
दफ़न कर देना धड़कनों के शोर में।

घोंट देना गला उसका, अपनी ही मुट्ठियों से?
या, रख देना पैरों तले कुचलकर।

क्यूँ ज़रूरी होता है?
अक्सर,

सत्य को अंगारे सा हाँथों में दबाए रखना,
या, सहन करना त्वचा में धँसी फाँस की तरह क्षण-क्षण।

क्यूँ ज़रूरी होता है?
सामने खड़े, सत्य से नज़रें चुराना,
कतराना, भाग जाना।

क्यूँ ज़रूरी होता है??

-अंशुल।

Wednesday, 28 March 2018

तेरी याद आई...

एक अज़ीज़ दोस्त, हम मिजाज़, हम ख़्याल, हम-प्याला, हम-निवाला यार के नाम.....(ये लफ्ज़ कुछ भी नहीं है तेरे आगे)

जब कभी दिल मेरा घबराया तेरी याद आई,
आज जब जाम उठाया तो, तेरी याद आई।

जब कभी सोग में डूबा मैं आँख भर सी गई,
मुझे तह-ए-दिल से यार, तेरी याद आई।

पास हैं लोग बहुत से मगर न जाने क्यों,
बारहा दिल को मेरे सिर्फ तेरी याद आई।

जब कभी भी हुआ घायल मैं चोट खाकर के,
बनके मरहम ज़हन में, यार तेरी याद आई।

यार के दिल को सिर्फ़ यार से ही राहत है,
दिल जो दुनिया ने जलाया तो, तेरी याद आई।

वक़्त बे वक़्त ठहाके, हँसी वो पागल सी,
वक़्त वो याद जो आया, तो तेरी याद आई।

साँस दर साँस मेरे दिल में तू भी आता है,
साँस के साथ मेरे यार तेरी याद आई।

एक हिस्सा मेरे वजूद का तुझमें गुम है,
क्या कहूँ यार बहुत मुझको तेरी याद आई।

तू भले कुछ भी कहे यार ये तेरा हक है,
सच मैं कहता हूँ बहुत यार तेरी याद आई।

Sunday, 25 March 2018

तस्वीर खिंचवाओ प्यारे।

आज के समय में प्रसिद्ध होना अत्यंत आवश्यक है, चाहे जिस प्रकार हो किन्तु होना अनिवार्य है।
प्रस्तुत है निम्नलिखित विधि, मौजूदा हालात में प्रसिद्धि पाने की।
विश्वास कीजिए कितना सरल है।
(व्यंगात्मक रचना)

करो तुम काम यों कितने ही न्यारे,
मगर तस्वीर भी खिंचवाओ प्यारे।

न केवल खींच अपने पास रक्खो,
वरन्, अख़बार में छपवाओ प्यारे।

नहीं माँगें जो संपादक महोदय,
स्वयं जाकर उन्हें दे आओ प्यारे।

अरे पढ़-लिख के तुम मत वक़्त काटो,
किसी ऊँचे क्लब में जाओ प्यारे।

नज़र आयोजकों पर रखो पैनी,
जहाँ हों, तुम लपककर जाओ प्यारे।

करो बातें यहाँ की, और वहाँ की,
बस उनकी हाँ में हाँ, मिलाओ प्यारे।

यूँ ही बिन बात के, फल-फूल लेकर,
कभी अध्यक्ष के घर जाओ प्यारे।

करो तारीफ़ इतनी, जैसे बस वे,
स्वयं भगवान हैं, बतलाओ प्यारे।

वो आमंत्रित करें या न करें पर,
स्वयं तुम गोष्ठियों में जाओ प्यारे।

प्रभावी लोग जो कुछ भी सुनाएँ,
तुरत जयगान उनका गाओ प्यारे।

प्रशंसा के बड़े पुल उनके बाँधो,
पड़ो चरणों में, बलि बलि जाओ प्यारे।

वहाँ से पर न खाली हाथ लौटो,
ज़रा तस्वीर भी खिंचवाओ प्यारे।

कराओ फ़्रेम, फिर सबको दिखाओ,
जगत से तुम, प्रसिद्धि पाओ प्यारे।

- अंशुल तिवारी
(अप्रैल, 2017/ पुणे)

Wednesday, 21 March 2018

वो जो ठहरा...

वो जो ठहरा, सो मिट गया देखो,
ज़िन्दगी दरिया की, रवानी है।

आज फिर हमें पार जाना है,
आज फिर समंदर तूफ़ानी है।

कोई भी चुन ले राह, और चल दे,
उम्र क्या सोच में बितानी है।

आज ये फ़ैसला होगा बस के,
जान लेनी है या लुटानी है।

हारना तय हो फिर भी खेलेंगे,
आज किस्मत भी आज़मानी है।

ख़्वाब ताबीर तक नहीं पहुँचे,
बस यही दिल को परेशानी है।

कोशिशें कीजिए, कुछ तो होगा,
यही सबक-ए-ज़िन्दगानी है।

-अंशुल।

Thursday, 1 March 2018

।।छंद।।

(1)

नासिका के आदि में, विराजती युगल जोरी,

वाम और दक्षिण की, छटा अति न्यारी है।।

जिनपे प्रसन्न हो वे, धन्य अनुभूति करें,

गोचर हों जो वे निर्वाण, अधिकारी हैं।।

तपती धरा को जैसे, त्राण देती बरखा है,

आकुल हृदय हित तैसे ही सुखारी है।।

प्यारी मनोहारी इस जोरि को विलोकत ही,

शोभा दूज चन्द्र की भी, जात बलिहारी है।।

(2)

नवल कमल खिल गए जैसे वाटिका में,

नयनों की जोरि समरूप ये बनाई है।।

पुष्प बीच गंध जिस भाँति है निवास करे,

मद की पिटारी दृग मध्य त्यों समाई है।।

पा गए जो दृष्टिपात, आप्तकंठ भाग्यवन्त,

भूरि-भूरि नयनों की महिमा ते गाई है।।

झील से गहन इन नयनों ने देखो आज,

प्रभुता समुद्र की भी, पल में भुलाई है।।

-अंशुल।।

Sunday, 18 February 2018

तजुर्बा

सारे किस्से की तर्जुमानी है,
बात थी राज़, अब ज़बानी है।

मिल भी जाए तो साथ क्या देगी?
यहाँ हर शै है क्या, बेमानी है।

जिसको दिल से लगाए बैठे हो,
ये क़ुर्बत-ए-जहाँ भी फ़ानी है।

हस्ती क्या है तुम्हारी और मेरी,
जैसे कोई मौज आनी-जानी है।

करवटें हर कदम पे लेती है,
ज़िन्दगी, पेचीदा कहानी है।

प्यार, सच्चाई, वफ़ादारी की,
बात अब हो चुकी पुरानी है।

वो जो ठहरा, सो मिट गया देखो,
ज़िन्दगी दरिया की, रवानी है।

आज फिर हमें पार जाना है,
आज फिर समंदर तूफ़ानी है।

कोई भी चुन ले राह, और चल दे,
उम्र क्या सोच में बितानी है।

आज ये फ़ैसला होगा बस के,
जान लेनी है या लुटानी है।

हारना तय हो फिर भी खेलेंगे,
आज किस्मत भी आज़मानी है।

ख़्वाब ताबीर तक नहीं पहुँचे,
बस यही दिल को परेशानी है।

कोशिशें कीजिए, कुछ तो होगा,
यही सबक-ए-ज़िन्दगानी है।

-अंशुल तिवारी।

Wednesday, 14 February 2018

आदमी

आदमी...

जब से संरचना हुई है संसार की।
बात तब से ही है विचार की।

के, प्रकृति ने बराबरी से किया सबका पोषण,
सहेज संवारा हर रचना को , दिया समान ही तोषण।

फिर ये देखकर हैरानी हुई, के कोई वहीँ पर रुक नहीं।
उसे प्रकृति ने जहाँ छोड़ा वहीँ पर झुका नहीं।

तो , समय को भी पछाड़कर,
दुर्गमता को। ललकार कर।

रखता चला गया काल के माथे पर चरण,
आदमी आगे निकल गया।

थे दो ही हथियार उसके,
अस्तित्व की इस जंग में।
नियंता की इस भेंट का उपयोग कर।
भलीभांति, सूझ बूझ से प्रयोग कर।

बुद्धि और भुजाओ का जोर लगाकर।
जो आया पथ में सामने उसे हटाकर।
्करता चला गया  निरंतर विजय का वरण।
आदमी बढ़ता चला गया।

विजय यात्रा उसकी यहीं पर रुकी नहीं।
महत्त्वाकांक्षा मूल्यों के आगे भी झुकी नहीं।
तो,
लगाकर आग मर्यादाओं में।
वो सेंकता चला गया स्वार्थ गूंथी रोटियाँ।
और,
गुज़रते वक़्त ने बढाया न केवल,
गति को, प्रगति को।
अपितु बदल के रख दिया पुरी मनःस्थिति को।

उसकी भूख कुछ यों बढ़ी,
ग्राह्य जो भी मिला सब निगल गयी।

और अब,
संवेदनाओ को जलाकर।
निज चेतना को भुलाकर।
मूल्यों को, मर्यादाओं को आग लगाकर।

आदमी जीता है, बस आदमी को "खा कर"।ं