सिद्धांत !!
इतना आसान नहीं होता किसी सिद्धांत को ललकारना, चुनौती देना, क्योंकि सिद्धांत यूँ ही नहीं उग आते, कुकुरमुत्ते की तरह या गाजर घास के झुंड की तरह।
सिद्धान्त जन्मते हैं अस्तित्व के पत्थर की पीठ पर, वास्तविकता की पथरीली भूमि पर, प्रकट सत्य की तेज़ आँच सहकर। सिद्धांत महज़ नियम नहीं होते, जिन्हें सहूलियत के अनुसार बदल जा सके। सिद्धांत तो अटल होते हैं, जैसे सदियों से अपनी जगह खड़ा कोई गिरी, न अपनी जगह छोड़ेगा, न ही झुकेगा। उन्हें बदलना उतना ही मुश्क़िल है जितना कि गुज़रे वक़्त को लौटा पाना।
बस यही विशिष्टता होती है सिद्धांतों की, फ़र्क इतना है कि इनमें कुछ प्रकृति के समन्वय से पैदा होते हैं और कुछ होते हैं जगत व्यवहार की उपज !!
पर इन बातों की चिंता आप न करें, आप तो बस सावधानी इतनी रखें कि किसी भी या किसी की बुद्धि जनित विचार को या नियम को सिद्धांत न मानें!! बुद्धि, नियम, विचार, चिंतन की सीमा है किंतु सिद्धांत उस मणि से होते हैं जो हर गज के मस्तक में नहीं बस्ती,
निश्चय की पराकाष्ठा से भी ऊपर उगने वाली सुदुर्लभ अमृत बूटी से होते हैं।
सिद्धांत, वही होते हैं...जो बार-बार कसे जाते हैं कसौटी पर। चाहे कसौटी समय की हो, या परिस्थिति की।
जिन्हें परीक्षा की आग पर सदा जलना होता है, जो सदा परखे जाते हैं, जाँचे जाते हैं, आँके जाते हैं।
सिद्धांत वही कहलाते हैं तो चोट को सहकर पाषाण से प्रतिमा बनते हैं, ताप को झेल कुंदन बनते हैं, इसी में उनका गौरव है।
तो आप भी कभी समय की कसौटी पर घिसे जाएँ, परिस्तिथि के पत्थर पे पीसे जाएँ तो याद रखें, स्वयं को साधुवाद कहना न भूलें।
इसलिए कि आपमें कुछ बात है। क्योंकि, यही प्रकृति का सिद्धांत है!!
-अंशुल तिवारी।