hamarivani badge

a href="http://www.hamarivani.com/update_my_blogg.php?blgid=4653" target="_blank">www.hamarivani.com

Tuesday, 25 December 2018

सिद्धांत !!!

सिद्धांत !!

इतना आसान नहीं होता किसी सिद्धांत को ललकारना, चुनौती देना, क्योंकि सिद्धांत यूँ ही नहीं उग आते, कुकुरमुत्ते की तरह या गाजर घास के झुंड की तरह।
सिद्धान्त जन्मते हैं अस्तित्व के पत्थर की पीठ पर, वास्तविकता की पथरीली भूमि पर, प्रकट सत्य की तेज़ आँच सहकर। सिद्धांत महज़ नियम नहीं होते, जिन्हें सहूलियत के अनुसार बदल जा सके। सिद्धांत तो अटल होते हैं, जैसे सदियों से अपनी जगह खड़ा कोई गिरी, न अपनी जगह छोड़ेगा, न ही झुकेगा। उन्हें बदलना उतना ही मुश्क़िल है जितना कि गुज़रे वक़्त को लौटा पाना।

बस यही विशिष्टता होती है सिद्धांतों की, फ़र्क इतना है कि इनमें कुछ प्रकृति के समन्वय से पैदा होते हैं और कुछ होते हैं जगत व्यवहार की उपज !!

पर इन बातों की चिंता आप न करें, आप तो बस सावधानी इतनी रखें कि किसी भी या किसी की बुद्धि जनित विचार को या नियम को सिद्धांत न मानें!! बुद्धि, नियम, विचार, चिंतन की सीमा है किंतु सिद्धांत उस मणि से होते हैं जो हर गज के मस्तक में नहीं बस्ती, 
निश्चय की पराकाष्ठा से भी ऊपर उगने वाली सुदुर्लभ अमृत बूटी से होते हैं।
सिद्धांत, वही होते हैं...जो बार-बार कसे जाते हैं कसौटी पर। चाहे कसौटी समय की हो, या परिस्थिति की।
जिन्हें परीक्षा की आग पर सदा जलना होता है, जो सदा परखे जाते हैं, जाँचे जाते हैं, आँके जाते हैं।
सिद्धांत वही कहलाते हैं तो चोट को सहकर पाषाण से प्रतिमा बनते हैं, ताप को झेल कुंदन बनते हैं, इसी में उनका गौरव है।
तो आप भी कभी समय की कसौटी पर घिसे जाएँ, परिस्तिथि के पत्थर पे पीसे जाएँ तो याद रखें, स्वयं को साधुवाद कहना न भूलें।
इसलिए कि आपमें कुछ बात है। क्योंकि, यही प्रकृति का सिद्धांत है!!

-अंशुल तिवारी।

किस्से !!!

किस्से...
सुना था जब ज़िन्दगी में कुछ समझ न आये...तो कोई किस्सा पढ़ो या सुनो।
किस्से तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हे तुम्हारी तनाव भरी दुनिया के चंगुल से निकाल कर ले जाएंगे अपनी दुनिया में...किस्सों की दुनिया में।
जहाँ तुम देखोगे वो सब जो कभी देखा ही नहीं तुमने, या सुना भी नहीं...कभी-कभी वो जो तुम चाहते थे हमेशा ही...जिसे पाने के लिए चल भी पड़े थे, पर एक कड़क आवाज़ सुनकर वापस लौट आये थे।
दिखेगा वो सपना भी जो हमेशा तुम्हारे भीतर पलता रहा, अमरबेल की तरह तुम्हारे विचार का थोड़ा-सा पानी पीकर ज़िंदा रहा, मरा नहीं।
जिसे तुमने हमेशा किसी पुराने कपड़े की तरह मन के दराज़ में सबसे नीचे ठूस दिया था!
किस्से तुम्हें ले जाएँगे वहाँ जहाँ तुम रहोगे, किसी नए इंसान की तरह, जैसे नए देश में नया नागरिक हो बिना पहचान पत्र के, या नए स्कूल में आया बच्चा बिना रोल नम्बर के। केवल तुम और तुम...न अतीत होगा, न भविष्य...सिर्फ तुम्हारे ख़्याल, चाहतें, तमन्नाएं वो भले जितनी असम्भव हों...मुक़म्मल होंगी....।
किस्से तुम्हें यकीन दिलाएंगे तुम्हारे अस्तित्व का,तुम्हें तुम्हारे होने का अहसास कराएंगे!! जिसे तुम भूलने लगे हो।
किस्से तुम्हारे साथी बनेंगे, साथ बैठकर बातें करेंगे तुमसे...तुम्हारी बातें! दूसरों की बातें! इधर की बातें! उधर की बातें!

मैंने ये सुना है...कभी तुम भी अकेलापन महसूस करो तो आना किस्सों की दुनिया में!!
कहानियों के लोक में!!

-अंशुल तिवारी।

Sunday, 23 December 2018

रचनाकार!!

सुबह-सुबह,
जब सब शुरू कर रहे थे...
अपने-अपने काम!!
वो भी उठा..
और लग गया
अपने काम में...
वो भागने लगा...और,,
तेज़ी से भागता रहा!!

कभी आँगन में,
दौड़ती धूप के पीछे!!

कभी खिड़की पे फुदकती,
चिड़िया के पीछे!!

कभी, खेत में नाचती,
लहराती, सरसों को पकड़ने!!
कभी, गुनगुनाती,
बलखाती, नदी को जकड़ने!!

कभी,
गरजते, घुमड़ते बादल को थामने!!
या, इंद्रधनुष पर कोई डोरी बांधने!!

कभी,
क्षितिज की दूरी नापने! या,
अनगिन तारों की संख्या भाँपने!!

कभी,
चमकते, चढ़ते चाँद को रोकने!! या,
जल्दी में चलती रात को टोकने!!

कभी, इतनी जल्द आ-जाने पर,
सूरज को डाँटने!
कभी,
सुबह उगी, ताज़ी-ताज़ी किरणें, छाँटने!
या,
बिखरी रोशनी में अपना हिस्सा बाँटने!!

वो भागता रहा, पर नाकाम रहा!
हर कोशिश का हार ही अंजाम रहा!!

सफ़लता, जब उसके हाथ न आई,
दुखी हो, इस छलावे से,
उसने ये तरकीब लगाई,
योजना बनाई!!
लेने इस पराजय का प्रतिशोध,
कलम उठाई,
कागज़ पर शब्दों की, सेना बनाई!!
और इन ख़यालों पर कर दी चढ़ाई!!
छंद, बंध के व्यूह में आख़िर,
ये ख़्याल उलझ गए।

जाल में कविता के आख़िर, फँस गए,
सदा-सदा के लिए, डायरी में बस गए।

इस तरह, उदासी का वो पल बीत गया,
कल्पना हार गई ,रचनाकार जीत गया।

- अंशुल तिवारी।
23.12.18
हरिद्वार।

Thursday, 6 December 2018

वह जवानी क्या??

वह जवानी क्या? के जो ना कर रही निर्माण हो।
वह जवानी क्या? के जो ना चढ़ रही परवान हो।
जो डिगा ना दे, गिरि को अपनी बस हुंकार से।
वह जवानी क्या? के जो ना कर रही उत्थान हो।

जो न बेड़ी डाल दे अविजित रिपु के पाँव में।
चीर धरती जो निकाले सुख, दुःखों की छाँव में।
जो न दहला दे अरिदल को महज़ ललकार से।
वह जवानी क्या? के जो ना शौर्य का परिमाण हो।

जो उठाये हाथ ना ढोने किसी के भार को।
जो न कर पाए प्रकाशित तेज से संसार को।
जो न आए सामने, निर्भीक हो प्रतिकार से।
वह जवानी क्या? के जिसका ध्येय ना परित्राण हो।

-अंशुल।

परित्राण- कष्ट से मुक्ति दिलाना।
परिमाण- मात्र, या नाप।
प्रतिकार- विरोध।
अरिदल- शत्रु का समूह।
अविजित रिपु- अजेय शत्रु।
ध्येय- लक्ष्य।

एक तरफ़ ज़िन्दगी का है जोखम..

उलझनें ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा होती हैं, ऐसा हिस्सा जो न हो तो भी मुसीबत और हो तो भी....

एक तरफ़ ज़िन्दगी का है जोखम,
एक तरफ़ शायरी का पेचो ख़म।

एक तरफ़ चोट, दर्द,आहें हैं,
एक तरफ़ ज़ख़्म के लिए मरहम।

एक तरफ़ ठेस, गर्म साँसें हैं,
एक तरफ़ बरसता सुकूँ हरदम।

एक तरफ़ सूख गया दरिया भी,
एक तरफ़ बारिशों का है मौसम।

एक तरफ़ गर्म लू के झोंके हैं,
एक तरफ़ ठंडी हवा, है मद्धम।

जाऊँ किस ओर यही सोचता हूँ,
फ़ैसला जंग से नहीं है कम।

-अंशुल।

छलावा...

रात गए,
कुछ ख़याल आ गए,
बस बेखटके,
बिना कहे कुछ,
अनचाहे मेहमानों जैसे।

आ धमके कमरे में मेरे,
धरना देकर बैठ गए फिर।

मैं तो बस सोने वाला था,
नींद में जा खोने वाला था।
दिनभर की सब दौड़-भाग,
और उठा-पटक से बचकर, छुपकर।
थके, परेशाँ चहरे को, अंधियारे से,
धोने वाला था।

लेकिन इन कम्बख्तों ने,
पुरज़ोर कोशिशें करके,
मुझको जगा दिया।

पास आ रही निद्रा, को भी भगा दिया।

मैं भी उठा, तैश में आया,
आज क़ैद कर लूँगा इनको,
सोच के काग़ज़ क़लम उठाया।

लेकिन तब ये मैंने पाया......

ख़याल मुझे फिर चकमा देकर चले गए थे,
बेक़सूर, हम रोज़ की तरह छले गए थे।

अब कमरे में मैं था, काग़ज़ क़लम वहीं थे,
निद्राहीन नयन थे, लेकिन शब्द नहीं थे।

- अंशुल तिवारी।
11.05.2017

यहाँ राहों में जो कोहरा...

यहाँ राहों में जो कोहरा घना है,
शहर के वास्ते किसने चुना है?

जहाँ देखो पड़ी है, गाँठ कोई,
ये ताना इस क़दर किसने बुना है?

शहर में बन गया कानून कैसा?
कहे जो सच वही बस अनसुना है।

जिसे हम-सब मसीहा मानते थे,
वही क़ातिल हमारा क्यूँ बना है??

जो डूबा है, वही तैरा यहाँ पर,
ये क़िस्सा हमने, माझी से सुना है।

कहाँ ले जाएँगी राहें तुम्हें ये?,
सफ़र बोलेगा जो तुमने चुना है।

कहें क्या?? तुम तो सबकुछ जानते हो,
मेरी चुप्पी को भी तुमने सुना है।

- अंशुल।

तुम्हारा साथ...

तुम्हारा साथ है,
जैसे भरोसा,
भरोसा जो भी होगा,
ठीक होगा।।

तुम्हारा साथ है,
जैसे दिलासा,
दिलासा ये कि मंज़िल,
मंज़िल पास होगी।

तुम्हारा साथ है,
मंदाकिनी-सा,
भरी है जिसमें शीतलता,
अनोखी।

तुम्हारा साथ है,
तारावली-सा,
प्रकाशित जिससे जीवन,
का ये पथ है।

तुम्हारा साथ है,
गीतावली-सा,
है गुंजित गीत-सा हर,
शब्द जिसका।

तुम्हारा साथ है,
जीवन का संबल,
है मुश्किल राह भी,
आसान जिससे।

- अंशुल।।

हिंदी दिवस!!!

हिंदी दिवस की सह्रदय बधाई....
हिंदी हम सबके मन की भाषा है ,विचारों की आत्मा है, शब्दों का प्राण है और अभिव्यक्ति का वरदान है। फिर भी हम हिंदी का दिन मनाते हैं ,ये अफ़सोस की बात है।

आज के अवसर पर एक व्यंग्यात्मक कविता...(शायद हम सब की सत्यता पर आधारित),
********************

बड़ा गर्व है आज हमें,हम हिंदी दिवस मानते हैं।
सुनकर, पढ़कर, हिंदी को हम आज बड़े हर्षाते हैं।

वसे हम हैं बड़े मॉडर्न पर संस्कारी भी तो हैं,
हिंदी की महिमा मण्डित करने में ज़ोर दिखाते हैं।

व्हाट्सएप्प हो या फ़ेसबुक के स्टेटस में या स्टोरी में,
अच्छी-अच्छी चार पंक्तियाँ, शिद्दत से चिपकाते हैं।

हिंदी के बिन क्या होगा, इस सकल जगत का सोचो तो,
कुछ ऐसे गंभीर प्रश्न कर, चिन्ता ख़ूब जताते हैं।

भीड़ जुटा, संगठन बनाकर, आयोजित एक बैठक कर,
पारंपरिक ढंग से सजने, कुर्ता प्रेस कराते हैं।

खादी की 'बादामी' अचकन, अपने तन पर धारण कर,
हिंदी समारोह में जाने को, तत्पर हो जाते हैं।

वहाँ बुलाकर किसी वृद्ध लेखक को, मंचासीन बना,
कितने हम भाषा प्रेमी हैं, लोगों को दिखलाते हैं।

और इस तरह कुछ घंटों में प्रेम जताकर हिंदी पर,
खाना खा-कर, छुट्टी पा-कर, अपने घर को जाते हैं।

बड़ी ख़ुशी की बात है हम, अपनी भाषा पर मान करें,
पर है दुःखप्रद बात अन्य दिन उसका हम अपमान करें।

बड़ा ढिंढोरा पीटें, दिन एक उत्सव खूब मनाएँ हम,
और अन्य दिन उस भाषा को बोलें और लजाएँ हम।

सोचो यदि होटल में जाकर हिंदी हम बोलेंगे,
सुनने वाले क्या सोचेंगे, हमको कैसे तौलेंगे।

और पार्टियों में जाकर जब हिंदी में बतियाओगे,
अपनी इज़्ज़त को क्या ख़ुद ही मिट्टी में मिलवाओगे,
ताने देंगे 'सुधिजन' तुमको, अनपढ़ ही कहलाओगे।

ऐसे क्षुद्र विचार लिए, हम समुन्नत कहलाते हैं,
प्रगत बुद्धि पर अपनी देखो, रह-रहकर इठलाते हैं।

सम्मेलन करने से बेहतर है संकल्प उठाएँ हम,
निज भाषा पर गर्व करें, मन से हिंदी अपनाएँ हम।

- अंशुल तिवारी।
(हिंदी दिवस विशेष)
...१४.०९.२०१७....

Wednesday, 5 December 2018

तलाश

पराये इस शहर में दिल चला फिर ढूंढने अपना कोई,
तलाश-ए-अंजुमन फिर रह गयी बेकार ही, बेज़ार ही.

किया क्या कुफ्र जो नादान ने खुद को ज़रा बहला लिया,
के बस चाहा था करना ज़िन्दगी गुलफाम ही, गुलज़ार ही.

मुक़द्दर के लिफाफे में था क्या रक्खा मेरी खातिर सनम,
नियामत बताकर दे गया सुलगे हुए अंगार ही.

रह-ए-गुज़र पर थे मिले जो चेहरे मुझको यहाँ,
ग़म बांटने के बस लगे थे सबपे इश्तेहार ही.

मिला न कोई अपना इस भरे बाजार की सी भीड़ में,
चला था साथ जिसके रह, गयी बस साथ में तन्हाई ही.

मैं भागता हूँ!!

मैं भागता हूँ।।

कभी कुछ पा जाने को,
किसी का हो जाने को।
कभी तो रूठ जाने को ,
कभी उसको मनाने को।
कभी दिल की सुनाने को,
कभी कुछ गुनगुनाने को।
कभी आंसू बहाने को,
तो कभी मुस्कुराने को।

मैं भागता हूँ,,

बाहों में सामाने को,
या पलकों पे उठाने को।
कभी कुछ पल चुराने को,
या फिर सब कुछ लुटाने को।
कभी बस डूब जाने को,
या उठ कर पार जाने को।
कभी कुछ याद करने को,
कभी कुछ भूल जाने को।

मैं भागता हूँ,,

कहीं पर पहुँच जाने को,
या वापस लौट आने को।

मैं भागत हूँ,,

कभी सब छोड़ जाने को,,

और कभी,,,......खुद से ही।

Tuesday, 4 December 2018

प्रतिशोध!!!

अपने भीतर छुपे तेज का होना बोध ज़रूरी है,
जीवन है रण सघन जगत में, तो प्रतिशोध ज़रूरी है।

सरल हृदय ने, मधुर वचन से, अब तक था संवाद किया,
सुनकर इसने कठिन शब्द भी, हँसकर ही प्रतिवाद दिया।

कुंद मना जन लेकिन इसको दुर्बलता ही मान गए,
मन के शुभ संकल्पों को ये, कायरता ही जान गए।

शांति, प्रेम की बोली को ये, हार तुम्हारी मान गए,
और विनयनत ग्रीवा को लाचार, तुम्हारी मान गए।

शब्द शिष्टता की सीमा से जब आगे बढ़ जाते हों,
तब निज स्वाभिमान के ख़ातिर, कुछ प्रतिरोध ज़रूरी है।

वो टूटा तारा!!

वो चमका था अंधेरी, स्याह शब में,
किसी को उसने था रस्ता दिखाया,
किसी का वो था बिछड़ा मीत जैसे,
किसी की रात का वो था सहारा,
किसी की मौज-ए-ग़म का था किनारा,
किसी के दिल का था वो एक टुकड़ा,
किसी की आँख का था नूर शायद,
किसी का वो सुनहरा ख़्वाब ही था,
किसी की ज़िंदगी की था वो मंज़िल,
किसी के दिल बहलने की वजह था,
किसी सीने को ठंडक की तरह था,
किसी आवारगी का था वो साथी,
किसी बुझते दिए कि था वो हिम्मत,
किसी उजड़े हुए खंडहर की रौनक,
किसी जलती शमाँ का हौसला था,
किसी के लिए बस इक सिलसिला था,

मग़र, वो था नहीं बस एक तारा,
किसी की थी वो जैसे सारी दुनिया।

कई धागे जुड़े थे उससे सबके,
सभी के ही जुड़े उससे थे रिश्ते।

मेरी भी थी उसी से एक ख़्वाहिश,
जो मैं चाहूँ वही दे जाए मुझको।

यही बस सोचकर देखा जो मैंने,
मेरी चाहत को ही करने मुकम्मल,
फ़लक से टूटकर यों गिर पड़ा वो,
मिला यों धूल में टूटा वो तारा,

मैं था हैरान के ये क्या हुआ था??
मेरी ख़्वाहिश हुई थी क्या मुकम्मल??
या टूटी थी, न जाने कितनीं दुनिया?

-अंशुल तिवारी।
हरिद्वार/ 04.12.18

Sunday, 2 December 2018

धूलि ब्रजधाम की!!

देवन्ह को दुर्लभ, सुर को सुलभ नाहिं,
ईश्वर को इच्छित है, धूलि ब्रजधाम की।
हरिपद अवतरी, गंग सम भावति है,
कृष्ण पद राजति ये, धूलि ब्रजधाम की।
चौदह भुवन तीन, लोक सब हारि गए,
हरि मन भाई है ये, धूलि ब्रजधाम की।
जप, तप, यज्ञ, दान, जेते कर्म ये महान,
फल योग सबको है, धूलि ब्रजधाम की।

- अंशुल तिवारी
(ब्रजधाम दर्शन)