वह जवानी क्या? के जो ना कर रही निर्माण हो।
वह जवानी क्या? के जो ना चढ़ रही परवान हो।
जो डिगा ना दे, गिरि को अपनी बस हुंकार से।
वह जवानी क्या? के जो ना कर रही उत्थान हो।
जो न बेड़ी डाल दे अविजित रिपु के पाँव में।
चीर धरती जो निकाले सुख, दुःखों की छाँव में।
जो न दहला दे अरिदल को महज़ ललकार से।
वह जवानी क्या? के जो ना शौर्य का परिमाण हो।
जो उठाये हाथ ना ढोने किसी के भार को।
जो न कर पाए प्रकाशित तेज से संसार को।
जो न आए सामने, निर्भीक हो प्रतिकार से।
वह जवानी क्या? के जिसका ध्येय ना परित्राण हो।
-अंशुल।
परित्राण- कष्ट से मुक्ति दिलाना।
परिमाण- मात्र, या नाप।
प्रतिकार- विरोध।
अरिदल- शत्रु का समूह।
अविजित रिपु- अजेय शत्रु।
ध्येय- लक्ष्य।
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